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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 399 of 918

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Page 399

प्र० ६९ : अ० १३ ] दास और श्रमिक सम्बन्धी नियम ३१५

(१) नदीवेगज्वालास्तेनव्यालोपरुद्धः सर्वस्वपुत्रदारात्मदानेनार्त-स्त्रातारमाहूय निस्तीर्णः कुशलप्रदिष्टं वेतनं दद्यात् । तेन सर्वत्रार्तदानानुशया व्याख्याताः ।
(२) लभेत पुंश्चली भोगं सङ्गमस्योपलिङ्गनात् ।
अतियाच्ञा तु जीयेत दौर्मत्याविनयेन वा ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे स्वाम्यधिकारो नाम त्रयोदशोऽध्यायः,
आदित एकोनसप्ततितमः ।

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( १ ) नदी के प्रवाह में बहता हुआ या अग्नि, चोर, सांप और हिंसक पशुओं से घिरा हुआ कोई व्यक्ति यदि जान बचाने की गरज से किसी को अपना सर्वस्व, स्त्री, पुत्र धन आदि, देने का वायदा कर आपत्ति से बच जाय तो उस पर तत्कालीन चतुर व्यक्ति जो भी निर्णय दे दें उसी के अनुसार रक्षक को दिया जाय । इसी प्रकार आपद्युक्त लोगों के दूसरे प्रणों के सम्बन्ध में भी जान लेना चाहिए ।

( २ ) वेश्या को चाहिए कि वह संभोग शुल्क को पहिले ही ले ले । यदि वह बुरी नियत से या डरा-धमका कर अनुचित तरीके से अधिक धन लेना चाहे तो उसे वह कदापि न दिया जाय ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में स्वाम्यधिकार नामक
तेरहवाँ अध्याय समाप्त

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