कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० ६६ : अ० १३ ] दास और श्रमिक सम्बन्धी नियम ३१३
(१) प्रक्षेपानुरूपश्चास्य निष्क्रयः ।
(२) दण्डप्रणीतः कर्मणा दण्डमुपनयेत् ।
(३) आर्यप्राणो ध्वजाहृतः कर्मकालानुरूपेण मूल्यार्धेन वा विमुच्येत ।
(४) गृहजातदायागतलब्धक्रीतानामन्यतमं दासमूनाष्टवर्षं विबन्धु-मकामं नीचे कर्मणि विदेशे दासीं वा सगर्भामप्रतिविहितगर्भभर्मण्यां विक्र-याधानं नयतः पूर्वः साहसदण्डः, क्रेतृश्रोतॄणां च ।
(५) दासमनुरूपेण निष्क्रयेणार्यमकुर्वतो द्वादशपणो दण्डः । संरोध-श्चाकारणात् । दासद्रव्यस्य ज्ञातयो दायादाः । तेषाम् अभावे स्वामी ।
(६) स्वामिनः स्वस्यां दास्यां जातं समातृकमदासं विद्यात् । गृह्या चेत् कुटुम्बार्थचिन्तनी, माता भ्राता भगिनी चास्या अदासाः स्युः ।
को चुकता कर वह आर्यश्रेणी में आ सकता है । इसी प्रकार उदरदास ( आजीवन दास ) और आहितक दास ( गिरवी रखा हुआ दास ) के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।
( १ ) गिरवी रखने के अनुसार ही उनके छुड़ाने का मूल्य भी होना चाहिए ।
( २ ) जिस व्यक्ति को दण्ड का धन भुगतान न करने के कारण दास बनना पड़ा हो, वह किसी तरह का कार्य कर उस धन का भुगतान करके स्वतन्त्र हो सकता है ।
( ३ ) आर्य जाति का कोई व्यक्ति यदि युद्ध में पराजित होने पर दास बनाया गया हो तो वह अपने कार्य के बल पर या समय के अनुसार या अपने पकड़े जाने का आधा मूल्य देकर छुटकारा पा सकता है ।
( ४ ) अपने ( स्वामी के ) घर में पैदा हुए, दाय-भाग के समय अपने हिस्से में आये या स्वयं खरीदे हुए, बन्धु-बान्धवों से रहित, आठ वर्ष से कम उम्र के दास को उसकी इच्छा के विरुद्ध, यदि कोई व्यक्ति नीच कार्य के लिए किसी विदेशी के हाथ बेचे या गिरवी रखे तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय; इसी प्रकार यदि कोई स्वामी गर्भिणी दासी को, उसके गर्भ की रक्षा का कोई प्रबन्ध न करके दूसरे के हाथ बेचे या गिरवी रखे तो उसको भी प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । इनके अति-रिक्त उनके खरीदने वालों और गवाहों को भी यही दण्ड दिया जाय ।
( ५ ) जो व्यक्ति उचित मूल्य पाने पर भी किसी को दासता से मुक्त नहीं करता, उस पर बाहर पण दण्ड किया जाय । यदि मुक्त न करने का कोई कारण न हो तो उसको कारवास का दण्ड दिया जाय । दास की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी उसके बन्धु-बांधव एवं कुटुम्बी लोग होते हैं । उनके न होने पर दास का स्वामी ही उसकी सम्पत्ति का अधिकारी है ।
( ६ ) यदि स्वामी द्वारा अपनी दासी में सन्तान पैदा हो जाय तो वह सन्तान