कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
Page 394 of 918
Read in context३१० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) द्रव्यभोगानामागमं चास्यानुयुञ्जीत । तस्य चार्थस्य व्यवहारोप-
लिङ्गनमभियोक्तुश्चार्थसामर्थ्यम् ।
(२) एतेन मिथस्समवायो व्याख्यातः ।
(३) तस्मात्साक्षिमदच्छन्नं कुर्यात्सम्यग्विभाषितम् ।
स्वे परे वा जने कार्यं देशकालाग्रवर्णतः ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे औपनिधिकं नाम द्वादशोऽध्यायः,
आदितोऽष्टसप्ततितमः ।
—: ० :—
से अलग-अलग उस माल को माँगा जाय । यदि दोनों ही देने से इन्कार करें तो पूर्वोक्त नियम का उपयोग किया जाय ।
(१) अदालत में शिल्पी से पूछा जाय कि 'यह जो तुम धन के कारण मौज उड़ा रहे हो, यह तुम्हें कहाँ से मिला है ?' इसके अतिरिक्त उस धन के व्यवहार एवं चिह्नों के सम्बन्ध में भी उससे तथा अभियोक्ता की आर्थिक दशा के सम्बन्ध में भी जाँच-पड़ताल की जाय ।
(२) इसी के अनुसार परस्पर व्यवहार करने वाले सभी व्यक्तियों के सम्बन्ध में समझना चाहिए ।
(३) इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने तथा पराये के व्यवहार में गवाह के सामने ही लेन-देन के सभी कार्यों की कहा-सुनी तथा लिखा-पढ़ी करे और साथ ही स्थान एवं समय का विशेष रूप से उल्लेख कर दे ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में औपनिधिक नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—