Skip to content
SarvaKosh
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 388 of 918

Read in context
Page 388
३०४कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ तीसरा अधिकरण

(१) कूटसाक्षिणो यमर्थमभूतं वा कुर्युर्भूतं वा नाशयेयुस्तद्दशगुणं दण्डं दद्युरिति मानवाः।
(२) बालिश्याद्वा विसंवादयतां चित्रो घात इति बार्हस्पत्याः।
(३) नेति कौटिल्यः। ध्रुवा हि साक्षिणः श्रोतव्याः। अशृण्वतां चतुर्विंशतिपणो दण्डः, ततोऽर्धमध्रुवाणाम्।
(४)

देशकालाविदूरस्थान् साक्षिणः प्रतिपादयेत्।
दूरस्थानप्रसारान् वा स्वामिवाक्येन साधयेत्॥

इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे ऋणग्रहणं नाम एकादशोऽध्यायः,
आदितोः सप्तषष्टितमः।

— : ० : —


(१) आचार्य मनु के अनुयायी विद्वानों का कहना है कि 'अकारण ही जो छली, प्रपञ्ची गवाह मुकदमा खड़ा करवा कर धन का नाश कराये, उन्हें उस नष्ट हुए धन का दस गुना दण्ड दिया जाय।'

(२) आचार्य बृहस्पति के मतानुयायी विद्वानों का अभिमत है कि 'अपनी मूर्खता से परस्पर विरुद्ध बोलने वाले गवाहों का, यातना देकर, वध किया जाय।'

(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य ऐसा कराना उचित नहीं मानते हैं। उनका कथन है कि 'साक्षियों की सुनी हुई बात सभी ठीक होती है। जो साक्षी किसी बात को ठीक तरह से हृदयंगम न करके गवाही देने को खड़े हो जाते हैं उनको चौबीस पण दण्ड दिया जाय। इसका आधा दण्ड उन्हें दिया जाय जो गवाह मामले को ठीक-ठीक नहीं बता पाते।

(४) अभियोक्ता को चाहिए कि देश-काल के अनुसार अधिक पास रहने वाले व्यक्ति को ही गवाह बनाये। अथवा न्यायाधीश की आज्ञा प्राप्त कर वह सुगमता से न आ सकने वाले दूर-देशस्थ गवाहों को भी अदालत में हाजिर करे।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में ऋणग्रहण नामक ग्यारहवां अध्याय समाप्त।

— : ० : —