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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 384 of 918

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Page 384

३०० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

दण्डः । तुच्छश्रावणायामभूतचतुर्गुणः । तस्य त्रिभागमादाता दद्यात्, शेषं प्रदाता ।

(१) दीर्घसत्रव्याधिगुरुकुलोपरुद्धं बालमसारं वा नर्णमनु वर्धेत । मुच्यमानमृणमप्रतिगृह्णतो द्वादशपणो दण्डः । कारणापदेशेन निवृत्तवृद्धिकमन्यत्र तिष्ठेत् ।

(२) दशवर्षोपेक्षितमृणमप्रतिग्राह्यमन्यत्र बालवृद्धव्याधितव्यसनिप्रोषितदेशत्यागराजविभ्रमेभ्यः ।

(३) प्रेतस्य पुत्राः कुसीदं दद्युः । दायादा वा रिक्थहराः सहग्राहिणः प्रतिभुवो वा । न प्रातिभाव्यमन्यत् । असारं बालप्रातिभाव्यम् । असंख्यातदेशकालं तु पुत्राः पौत्रा दायादा वा रिक्थं हरमाणा दद्युः ।

(४) जीवितविवाहभूमिप्रातिभाव्यमसंख्यातदेशकालं तु पुत्राः पौत्रा वा वहेयुः ।


को अधिक कहा जाय और जब गवाहियाँ ली जाँय, उस समय गवाह जितना धन बतायें, उसका चौगुना दण्ड अधमर्ण और उत्तमर्ण दोनों को दिया जाना चाहिए । उसमें से तीन भाग अधमर्ण ( ऋण लेने वाला ) और बाकी उत्तमर्ण ( ऋण देने वाला ) अदा करे ।

( १ ) लम्बी अवधि तक यज्ञकार्य में लगे हुए, व्याधिग्रस्त, गुरुकुल में अध्यन करने वाले, बालक और अशक्त आदि व्यक्तियों के ऋण पर ब्याज नहीं जोड़ा जाना चाहिए । यदि कर्जदार अपने कर्जे की अन्तिम रकम को अदा करें और धनिक उसको न ले तो, धनिक पर बारह पण का दण्ड दिया जाना चाहिए । यदि न लेने का कोई विशेष कारण हो तो वह रकम बिना सूद के कहीं और जमा कर दी जानी चाहिए ।

( २ ) यदि कोई उत्तमर्ण दस वर्ष के अन्दर अपना कर्जा वसूल नहीं कर पाता तो उस धन पर उसका फिर कोई अधिकार नहीं रहता है । यदि वह कर्जे का धन बाल, बूढ़े, बीमार, आपद्ग्रस्त, प्रवासी, देशत्यागी या राजकाज से बाहर गए किसी व्यक्ति का हो तो वह दस वर्ष बाद भी उस धन का अधिकारी माना जायेगा ।

( ३ ) यदि ऋण लेने वाला ( अधमर्ण ) मर जाय तो उसका पुत्र ऋण को चुकता करे । अथवा उसके वारिस या उसके साथ काम करने वाले जामिन हिस्सेदार उसके ऋण को अदा करें । इनके अतिरिक्त ऐसे मृतक अधमर्ण के ऋण का जामिन दूसरा न माना जाय, बालक जामिन होने का अधिकारी नहीं है । जिस ऋण का स्थान तथा समय निश्चित नहीं है, उसको कर्जेदार के पुत्र, पौत्र या दूसरे दायभागी अदा करें ।

( ४ ) जो कर्जा आजीविका, विवाह और जमीन के लिए लिया गया हो उसको