कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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(१) क्षेत्रिकस्याक्षिपतः क्षेत्रमुपवास्य वा त्यजतो बीजकाले द्वादशपणो दण्डः। अन्यत्र दोषोपनिपाताविषह्येभ्यः।
(२) करदाः करदेष्वाधानं विक्रयं वा कुर्युः। ब्रह्मदेयिका ब्रह्मदेयिकेषु, अन्यथा पूर्वः साहसदण्डः; करदस्य वाऽकरदग्रामं प्रविशतः।
(३) करदं तु प्रविशतः सर्वद्रव्येषु प्राकाम्यं स्यादन्यत्रागारात्। तदप्यस्मै दद्यात्।
(४) अनादेयमकृषतोऽन्यः पंचवर्षाण्युपभुज्य प्रयासनिष्क्रयेण दद्यात्।
(५) अकरदाः परत्र वसन्तो भोगमुपजीवेयुः।
पाँच-सौ पण और स्थानीय, राष्ट्र तथा चरागाह का रास्ता रोकने पर एक हजार का दण्ड दिया जाय। यदि कोई व्यक्ति इन रास्तों को खोदने या जोतने के अलावा कोई हानि पहुँचाये तो उस पर ऊपर बताये गये दण्डों का चौथाई दण्ड दिया जाय। खोदने या जोतने पर पूर्वोक्त सभी दण्ड दिये जाने चाहिए।
(१) गांव में रहने वाला किसान यदि बीज बोने के समय बीज न बोये या खेत को ही छोड़ दे, तो उसे बारह पण दण्ड दिया जाय; किन्तु खेत के किसी दोष के कारण या किसी आकस्मिक आपत्ति के कारण अथवा असमर्थ होने के कारण यदि वह ऐसा करता है तो वह अदण्ड्य है।
(२) गाँवों का बन्दोबस्त—लगान देने वाले किसान, लगान देने वालों के यहाँ ही अपनी जमीन गिरवी रख सकते हैं अथवा बेच सकते हैं। जिनको बिना लगान की धर्मार्थ भूमि दी गई है, वे अपने समान लोगों के ही हाथ अपनी जमीन गिरवी रख सकते हैं या बेच सकते हैं। इन नियमों का उल्लंघन करने वालों को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय। यही दण्ड उस व्यक्ति को भी दिया जाय, जो लगान देने वाले गाँव के निवास को छोड़कर लगान न देने वाले गाँव में बस जाने की इच्छा से प्रवेश करे।
(३) यदि वह पुनः लगान देने वाले गाँव में ही बसने लगे, तो उसे मकान के अलावा सभी बातों की छूट दी जाय। अथवा उचित हो तो मकान भी उसको दे दिया जाय।
(४) जो किसान अपनी जमीन को नहीं जोते उसको दूसरा किसान बिना लगान दिये ही जोत सकता है और वह पांच वर्ष तक उसका उपयोग कर उस जमीन को उसके मालिक को सौंप दे; किन्तु उस जमीन को ठीक करने में उसका जो खर्चा और मेहनत लगी हो, उसका मूल्य वह मालिक से वसूल कर ले।
(५) जिनके पास बिना लगान की धर्मार्थ जमीन है, दूसरी जगह रहते हुए भी, वे अपनी उस जमीन के पूरे अधिकारी हैं।