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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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प्रक० ४, अलेक्जैंडर, पृ० २३२)। प्राचीन भारत के राजसंघों में क्षत्रियों और श्रेणियों का अधिकता से उल्लेख पाया जाता है।

मंत्रिपरिषद्

प्राचीन भारत में राष्ट्र-संघटन की दृष्टि से मंत्रिपरिषद् का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसकी उत्पत्ति वैदिक युग की राष्ट्रीय सभा से हुई, किन्तु बाद में हिन्दू राज्यों के अभ्युदय तथा उन्नयन की दृष्टि से उसकी उपयोगिता निरन्तर बढ़ती गयी। धर्म, अर्थ, शासन, न्याय आदि विषयों पर लिखे गये ग्रन्थों में मंत्रिपरिषद् पर इसीलिए गंभीरता से विचार किया गया कि एक चिरस्थायी एवं सर्वांगीण साम्राज्य की सुरक्षा-व्यवस्था के लिये उसकी पर आवश्यकता है।

कौटिल्य ने मंत्रियों की इस सभा को 'मंत्रिपरिषद्' ही कहा है (अर्थशास्त्र, पृ० ४७) इससे पहले जातक (खण्ड ६, पृ० ४०५, ४३१) महावस्तु (खंड २, पृ० ४१६-४४२) और अशोक के शिलालेखों (तीसरा, छठा) में उसको परिसा कहा गया है। धर्मसूत्र, धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र विषय के ग्रन्थों में कहा गया है मंत्रिपरिषद् की स्वीकृति तथा उसके सहयोग के बिना राजा को कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। मनु ने कहा है कि छोटे-बड़े सभी कार्य राजा को मंत्रिपरिषद् के साथ विचार करके करने चाहिए (मनुस्मृति ७।३०-३१, ५५, ५६)। याज्ञवल्क्य (याज्ञवल्क्यस्मृति १।३११) तथा अन्य ग्रन्थकारों ने भी यही बात कही है।

कौटिल्य यद्यपि एक राज्य-शासन-प्रणाली का समर्थक रहा है, जिसमें राजा ही एकमात्र कर्ता-धर्ता होता है, किन्तु मंत्रिपरिषद् की अनिवार्यता को उसने भी माना है। उसका कहना है कि राजा को अपने प्रत्येक महत्त्वपूर्ण कार्य मंत्रिपरिषद् के परामर्श से करने चाहिए और संदिग्ध या विवादग्रस्त विषयों में जो बहुमत द्वारा समर्थित हों उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए (अर्थशास्त्र, पृ० ४७)। कौटिल्य ने कहा है कि इन्द्र का सहस्राक्ष अभिधान इसलिये हुआ कि उसकी मंत्रिपरिषद् में एक हजार बुद्धिमान् सदस्य थे। वे ही उसके नेत्र कहे जाते थे (अर्थशास्त्र, पृ० ४७)।

संपूर्ण प्रजा, सारा राज्य और यहां तक कि राजा भी मंत्रिपरिषद् पर निर्भर है। अर्थशास्त्र की दृष्टि से मंत्री के बिना राजा का कोई अस्तित्व नहीं है। राजा और मंत्री के पारस्परिक संबंध और राज्य के लिये उनकी क्या आवश्यकता है, इसकी चर्चा करते हुए कौटिल्य ने लिखा है कि राजा और

३ कौ० भू०