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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 325 of 918

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Page 325
प्रकरण ५३-५४## समाहर्तृप्रचारः
अध्याय ३५### गृहपतिवैदेहकतापसव्‍यञ्‍जनाः प्रणिधयः

(१) समाहर्ता चतुर्धा जनपदं विभज्य ज्येष्ठमध्यमकनिष्ठविभागेन ग्रामाग्रं परिहारकमायुधीयं धान्यपशुहिरण्यकुप्यविष्टप्रतिकरमिदमेतावदिति निबन्धयेत्।

(२) तत्प्रदिष्टः पञ्चग्रामीं दशग्रामीं वा गोपश्चिन्तयेत्।

(३) सीमावरोधेन ग्रामाग्रं कृष्टाकृष्टस्थलकेदारारामषण्डवाटवनवास्तुचैत्यदेवगृहसेतुबन्धश्मशानसत्रप्रपापुण्यस्थानविवीतपथिसंख्यानेनक्षेत्राग्रं, तेन सीम्नां क्षेत्राणां च मर्यादारण्यपथिप्रमाणसम्प्रदानविक्रयानुग्रहपरिहारनिबन्धान् कारयेत्। गृहाणां च करदाकरदसंख्यानेन।


समाहर्त्ता और गुप्तचरों के कार्यों का निरूपण

(१) समाहर्त्ता (रेवेन्यू कलक्टर) को चाहिए कि वह सारे जनपद को चार हिस्सों में बाँटकर उन्हें श्रेष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ के क्रम से उनकी गणना, उपज, भौगोलिक परिस्थिति उनका नकशा, खसरा एवं रकवा आदि को अपने रजिस्टर में दर्ज कर ले; जो गाँव नियमित रूप से सैनिक जवानों को दें तथा जो गाँव अन्न, पशु, सोना, चाँदी, नौकर-चाकर आदि को नियमित रूप से दें, उनका व्योरा भी रजिस्टर में दर्ज कर लें।

(२) समाहर्त्ता के आदेशानुसार पाँच-पाँच या दस-दस गावों का एक-एक केन्द्र बनाकर उसका प्रबन्ध गोप नामक अधिकारी करे।

(३) नदी, पहाड़, जंगल, दीवाल आदि के द्वारा गाँवों की सरहदबन्दी करके उसको रजिस्टर में चढ़ाया जाय, खेतों का व्योरा चढ़ाने वाले रजिस्टर में इतनी बातें दर्ज रहनी चाहिये; खेती योग्य जमीन, खेती के अयोग्य या पथरीली जमीन, ऊँची-नीची जमीन, साठी-गेहूँ योग्य जमीन, बाग-बगीचे योग्य जमीन, केले के योग्य जमीन, ईख के योग्य जमीन, जंगल के योग्य जमीन, आबादी के योग्य जमीन, चैत्य, देवालय, तालाब, श्मशान, अन्नक्षेत्र, प्याऊ, तीर्थस्थान, चरागाह, और रथ-गाड़ी तथा पैदल मार्ग के योग्य जमीन। इसी प्रकार नदी, पर्वत आदि सरहद और खेतों की लम्बाई-चौड़ाई का भी उल्लेख होना चाहिए। इन बातों के अलावा ऐसे जंगल,

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