कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context२१८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) पङ्कूविषमव्याधिजरातोयाहारावसन्नं वृक्षतटकाष्ठशिलाभिहतमी-
शानव्यालसर्पग्राहदावाग्निविपन्नं विनष्टम् । प्रमादादभ्यावहेयुः ।
(२) एवं रूपाग्रं विद्यात् ।
(३) स्वयं हन्ता घातयिता हर्ता हारयिता च वध्यः । परपशूनां राजा-
ङ्केन परिवर्तयिता रूपस्य पूर्वं साहसदण्डं दद्यात् ।
(४) स्वदेशीयानां चोरहृतं प्रत्यानीय पणिकं रूपं हरेत् । परदेशीयानां
मोक्षयितार्धं हरेत् ।
(५) बालवृद्धव्याधितानां गोपालकाः प्रतिकुर्युः ।
(६) लुब्धकश्वगणिभिरपास्तस्तेनव्यालपरबाधभयमृतुविभक्तमरण्यं
चारयेयुः ।
(७) सर्पव्यालत्रासनार्थं गोचरानुपातज्ञानार्थं च त्रस्नूनां घण्टातूर्यं च
बध्नीयुः ।
(१) दल-दल में फँसी, गढ़े में गिरी, बीमार, बूढ़ी, पानी तथा आहार के अभाव में नष्ट, वृक्ष तले दबी, चट्टान या शिलाओं से जख्मी, बिजली गिर जाने से नष्ट, हिंसक जानवरों से आक्रान्त, साँप, नाक या जंगली आग से नष्ट, गायों को विनष्ट कहते हैं। यदि इस प्रकार गाय आदि का विनाश गायों की असावधानी के कारण होवे तो उस हानि को वे स्वयं पूरा करें।
(२) अध्यक्ष को चाहिए कि वह इन सभी बातों की पूरी जानकारी रखे।
(३) यदि कोई ग्वाला गाय को मारे, या किसी से मरवावे; उसकी चोरी करे, या करवावे; तो उसे प्राणदण्ड दिया जाना चाहिए। जो गाय-भैंस सरकारी नहीं हैं उन पर राजकीय चिह्न कर उनके रूप को बदल देने वाले व्यक्ति को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।
(४) चोरों से चुराये गये अपने देश के पशुओं को जो व्यक्ति उनके वास्तविक स्वामियों को वापिस कर दे, मालिक से वह प्रति पशु के पीछे एक पण वसूल कर ले। चोरों से छुड़ाये गये परदेश के पशुओं का आधा हिस्सा मालिक का और आधा हिस्सा छुड़ाने वाले का होता है।
(५) गोपालकों को चाहिए कि वे, बछड़ों, बीमार और बूढ़े पशुओं की उचित परिचर्या करें।
(६) गोपालकों को चाहिए कि वे शिकारियों, बहेलियों, चोरों, हिंसकों और शत्रु की बाधाओं आदि से सावधान रह कर ऋतु के अनुसार सुरक्षित जंगलों में गायों को चरायें।
(७) सर्प एवं हिंसक पशुओं को डराने के लिए, चरागाह में गाय की पहिचान के लिए और घबड़ाने वाले पशुओं की गर्दन में लोहे की घंटी बाँध देनी चाहिए।