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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 300 of 918

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Page 300
प्रकरण ४५
अध्याय २९

गोऽध्यक्षः


(१) गोऽध्यक्षो वेतनोपग्राहिकं करप्रतिकरं भग्नॊत्सृष्टकं भागानुप्रविष्टकं व्रजपर्यग्रं नष्टं विनष्टं क्षीरघृतसञ्जातं चोपलभेत ।
(२) गोपालकपिण्डारकदोमन्थकलुब्धकाः शतं शतं धेनूनां हिरण्यभृताः पालयेयुः । क्षीरघृतभृता हि वत्सानुपहन्युरिति वेतनोपग्राहिकम् ।
(३) जरद्गुधेनुगर्भिणीपष्ठौहीवत्सतरीणां समविभागं रूपशतमेकः पालयेत् । घृतस्याष्टौ वारकान् पणिकं पुच्छं अङ्कचर्म च वार्षिकं दद्यादिति करप्रतिकरः ।
(४) व्याधितान्त्यङ्गान्यन्यदोहीदुर्दोहापुत्रघ्नीनां च समविभागं रूपशतं पालयन्तस्तज्जातिकं भागं दद्युरिति भग्नॊत्सृष्टकम् ।


पशुविभाग का अध्यक्ष

( १ ) गो, भैंस आदि पालतू पशुओं की देख-रेख में नियुक्त अधिकारी (गोऽध्यक्ष) को चाहिए कि वह १. वेतनीपग्राहिक, २. करप्रतिकर, ३. भग्नॊत्सृष्टक ४. भागानुप्रविष्टक ५. व्रजपर्यग्र, ६. नष्ट, ७. विनष्ट और ८. क्षीरघृतसञ्जात, इन आठों के सम्बन्ध में पूरी जानकारी प्राप्त करे ।

( २ ) गायों को पालने वाले ( गोपालक ), भैंसों को पालने वाले (पिण्डारक), गाय, भैंस को दुहने वाले ( दोहक ), दही को मथने वाले ( मंथक ) और हिंसक पशुओं से गाय, भैंस की रक्षा करने वाले ( लुब्धक ), ये पाँच-पाँच व्यक्ति मिलकर सौ-सौ गाय, भैंसों का पालन करें । वेतन के रूप में इनको या तो नकद रुपया दिया जाय अथवा अन्न-वस्त्र दिये जाँय; दूध, दही आदि में इनका कोई हिस्सा नहीं होना चाहिए, क्योंकि दूध, दही में इनका हिस्सा होने के कारण ये लोग बछड़ों को मार देते हैं । गाय, भैंस आदि की रक्षा के इस उपाय का नाम वेतनोपग्राहिक है ।

( ३ ) बूढी, दूध देने वाली, गाभिन, पठोरी और बछिया, इन पाँच प्रकार की गायों को बीस-बीस के क्रम से सौ बनाकर उन्हें किसी चरवाहे को ठेके पर दिया जाय । इसके बदले में चरवाहा गौओं के मालिक को आठ वारक घी, एक-एक पशु के पीछे एक-एक पण, और सरकारी मुहर से युक्त मरे हुए पशु का एक अदद चमड़ा प्रतिवर्ष दिया करे; रक्षा के इस उपाय को करप्रतिकर कहते हैं ।

( ४ ) बीमार, कानी, लंगड़ी, एकहथी ( अनन्यदोही ), मुश्किल से दुही जाने