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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 218 of 918

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Page 218
१३४कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) अष्टप्लोतिसङ्घात्या कृष्णा भिङ्गिसी वर्षवारणम्, अपसारक इति नैपालकम् ।
(२) संपुटिका चतुरश्रिका लम्बरा कटवानकं प्रावरकः सत्तलिकेति मृगरोम ।
(३) वाङ्गकं श्वेतं स्निग्धं दुकूलं, पौण्ड्रकं श्यामं मणिस्रिग्धं, सौवर्णकुड्यकं सूर्यवर्णम् । मणिस्रिग्धोदकवानं चतुरश्रवानं व्यामिश्रवानं च ।
(४) एतेषामेकांशुकमध्यर्धद्वित्रिचतुरंशुकमिति ।
(५) तेन काशिकं पौण्ड्रकं च क्षौमं व्याख्यातम् ।
(६) मागधिका पौण्ड्रिका सौवर्णकुड्यका च पत्रोर्णाः नागवृक्षो


( १ ) काले रंग के आठ टुकड़ों को जोड़कर भिंगिसी बनाई जाती है, जो कि वर्षा में भींगने से बचाती है । इसी तरह एक ही साबूत कपड़े का बना अपसारक कहलाता है । ये कपड़े नैपाल देश में बनते हैं ।

( २ ) मृग के बालों से छह प्रकार का कपड़ा बनाया जाता है : १. संपुटिका, ( जांघिया या सुथनी ), २. चतुरश्रिका, ३. लम्बरा, ४. कटवानक, ५. प्रावरक और ६. सत्तलिका ।

( ३ ) दुशाला देश भेद से तीन प्रकार का होता है : १. वांगक, २. पौण्ड्रक ३. सौवर्णकुड्यक । वांगक अर्थात् बङ्गाल में बना हुआ दुशाला सफेद एवं चिकना होता है, पौंड्रक अर्थात् पुंड्र देश में बना हुआ दुशाला काला एवं मणि के समान स्निग्ध होता है, और असम के सुवर्णकुड्य नामक स्थान में बना हुआ दुशाला सूर्य के समान चमकदार होता है । इन दुशालों की बुनावट तीन प्रकार की होती है १. दुशाले बनाने के साधनभूत तन्तु पहिले पानी में भिगो दिए जाय, फिर मणिवन्ध में रगड़कर उन्हें मजबूत बना दिया जाय २. ताना और बाना दोनों का तागा एक-सा बारीक हों, इस प्रकार की बनावट ३. कपास, रेशम, ऊन आदि मिले हुए तन्तुओं से रंगीन बुनावट करना ।

( ४ ) जिसके ताने और बाने में एक जैसे बारीक तन्तु हों, वह उत्तम दुशाला है, इनसे ड्योढ़े, दुगने, तिगुने आदि मोटे तन्तुओं के होने पर उत्तरोत्तर वह दुशाला कम कीमत का समझा जाता है ।

( ५ ) इसी प्रकार काशी तथा पुंड्र आदि में बनने वाले रेशमी वस्त्रों की उत्कृष्टता-निकृष्टता के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए, अर्थात् रेशम के तन्तु जितने बारीक और एक सूत के होंगे, रेशम उतना ही उत्तम होगा और तन्तुओं के मोटे होने पर उत्तरोत्तर वह निकृष्ट समझा जायगा ।

( ६ ) मगध, पुंड्रक और सुवर्णकुड्यक, इन तीन देशों में पत्रोर्णा नाम की ऊन होती है । वह नागकेसर, बड़हर, मौलसरी और बरगद, इन चार पेड़ों से पैदा