कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
Page 198 of 918
Read in context| प्रकरण २५ | # उपयुक्तपरीक्षा |
|---|---|
| अध्याय ९ |
(१) अमात्यसम्पदोपेताः सर्वाध्यक्षाः शक्तितः कर्मसु नियोज्याः । कर्मसु चैषां नित्यं परीक्षां कारयेत्, चित्तानित्यत्वान्मनुष्याणाम् । अश्वसधर्माणो हि मनुष्या नियुक्ताः कर्मसु विकुर्वते ।
(२) तस्मात् कर्तारं कारणं देशं कालं कार्यं प्रक्षेपमुदयं चैषु विद्यात् । ते यथासन्देशमसंहता अविगृहीताः कर्माणि कुर्युः । संहता भक्षयेयुः । विगृहीता विनाशयेयुः । न चानिवेद्य भर्तुः किञ्चिदारब्धं कुर्यु रन्यत्रापत्प्रतीकारेभ्यः । प्रमादस्थानेषु चैषामत्ययं स्थापयेद् दिवसवेतनव्ययद्विगुणम् ।
राजकीय उच्चाधिकारियों के चाल-चलन की परीक्षा
(१) राजकीय उच्चपदस्थ कर्मचारियों को अमात्य के गुणों से युक्त होना चाहिए, योग्यता एवं कार्यक्षमता के आधार पर ही उन्हें भिन्न-भिन्न पदों पर नियुक्त किया जाना चाहिए। उपयुक्त पदों पर नियुक्त किए जाने के अनन्तर समय-समय पर राजा उनके चाल-चलन की निगरानी कराता रहे, क्योंकि मनुष्यों की चित्त-वृत्तियां सदा एक जैसी नहीं रहती हैं। देखा यह जाता है कि कभी-कभी मनुष्य भी घोड़ों की आदत जैसा आचरण करने लगते हैं। अर्थात् घोड़ा जैसे अपने स्थान पर बँधा हुआ शान्त दिखाई देता है, किन्तु रथ आदि में जोड़ते ही वह बिगड़ पड़ता है, वैसे ही स्वभाव से शांत दिखाई देने वाला मनुष्य भी कार्य पर नियुक्त हो जाने के बाद उद्दण्ड हो जाता है।
(२) इसलिए राजा को चाहिए कि अध्यक्षों के सम्बन्ध में वह कारण (अधीनस्थ कर्मचारी), देश, काल, कार्य, वेतन और लाभ, इन बातों की जानकारी रखे। उच्चपदस्थ कर्मचारियों को भी चाहिए कि वे राजा के आदेशानुसार एक-दूसरे से द्वेष न करते हुए जुदा-जुदा रह कर ही अपने कार्यों में तत्पर रहें। यदि वे आपस में मिल जायेंगे तो राजधन का अपहरण करेंगे और परस्पर द्वेष करेंगे तो राजकार्यों को नष्ट कर देंगे। कर्मचारियों को चाहिए कि राजा की आज्ञा प्राप्त किए बिना वे किसी भी नये कार्य का आरंभ न करें, किन्तु आपत्तियों का प्रतीकार करने के लिए किये जाने योग्य कार्यों को वे राजा की अनुमति प्राप्त किए बिना भी आरंभ कर