कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
Page 175 of 918
Read in context| प्रकरण २० | |
|---|---|
| अध्याय ४ | # दुर्गनिवेशः |
(१) त्रयः प्राचीना राजमार्गास्त्रय उदीचीना इति वास्तुविभागः। स द्वादशद्वारो युक्तोदकभूमिच्छन्नपथः।
(२) चतुर्दण्डान्तरा रथ्याः। राजमार्गद्रोणमुखस्थानीयराष्ट्रविवीतपथाः संयानीयव्यूहश्मशानग्रामपथाश्चाष्टदण्डाः। चतुर्दण्डः सेतुवनपथः। द्विदण्डो हस्तिक्षेत्रपथः। पञ्चारत्नयो रथपथश्चत्वारः पशुपथो द्वौ क्षुद्रपशुमनुष्यपथः।
(३) प्रवीरे वास्तुनि राजनिवेशश्चातुर्वर्ण्यसमाजीवे। वास्तुहृदयादुत्तरे नवभागे यथोक्तविधानमन्तःपुरं प्राङ्मुखमुदङ्मुखं वा कारयेत्। तस्य
दुर्ग से संबंधित राजभवनों तथा नगर के प्रमुख स्थानों का निर्माण
( १ ) वास्तुविद्याविशेषज्ञों के निर्देशानुसार जिस भूमि को नगर-निर्माण के लिए चुना जाय उसमें पूरब से पश्चिम की ओर और उत्तर से दक्षिण की ओर जाने वाले तीन-तीन राजमार्ग हों। इन छह राजमार्गों में नगर-निर्माण या गृह-निर्माण की भूमि का विभाग करना चाहिए। चारों दिशाओं में कुल मिलाकर बारह द्वार हों, जिसमें जल, थल तथा गुप्त मार्ग बने हों।
( २ ) नगर में चार दण्ड ( २४ फीट ) चौड़ी रथ्याएँ ( छोटी गलियाँ ) हों। राजमार्ग, द्रोणमुख ( चार सौ गाँवों का मुख्य केन्द्र ), स्थानीय ( आठ सौ गाँवों का मुख्य केन्द्र ) राष्ट्र, चरागाह, संयानीय ( व्यापारी मंडियाँ ), सैनिक छावनियाँ, श्मशान और गाँवों की ओर जाने वाली सभी सड़कों की चौड़ाई आठ दण्ड ( १६ गज ) होनी चाहिये। जलाशयों तथा जंगलों की ओर जाने वाली सड़कों की चौड़ाई चार दंड होनी चाहिये। हाथियों के आने-जाने का मार्ग और खेतों को जाने वाला रास्ता दो दंड चौड़ा होना चाहिये। रथों के लिए पाँच अरत्नि ( ढाई गज ) और पशुओं के चलने का रास्ता दो गज चौड़ा होना चाहिये। मनुष्य तथा भेड़-बकरी आदि छोटे पशुओं के लिए एक गज चौड़ा रास्ता होना चाहिए।
( ३ ) नगर के सुदृढ़ भूमिभाग में राजभवनों का निर्माण कराना चाहिए; साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह भूमि चारों वर्णों की आजीविका के लिए