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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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प्र० १५ : अ० १६ ] राजभवन का निर्माण ६७

(१) अन्तर्गृहगतः स्थविरस्त्रीपरिशुद्धां देवीं पश्येत् । न काञ्चिदभिगच्छेत् । देवीगृहे लीनो हि भ्राता भद्रसेनं जघान; मातुः शय्याऽन्तर्गतश्च पुत्रः कारूशम् । लाजान् मधुनेति विषेण पर्यस्य देवी काशिराजं, विषदिग्धेन नूपुरेण वैरन्त्यं, मेखलामणिना सौवीरं, जालूथमादर्शेन, वेण्यां गूढं शस्त्रं कृत्वा देवी विडूरथं जघान । तस्मादेतान्यास्पदानि परिहरेत् ।

(२) मुण्डजटिलकुहकप्रतिसंसर्गं बाह्याभिश्च दासीभिः प्रतिषेधयेत् । न चैनाः कुल्याः पश्येयुरन्यत्र गर्भब्याधिसंस्थाभ्यः । रूपाजीवाः स्नानप्रघर्षशुद्धशरीराः परिवर्तितवस्त्रालङ्काराः पश्येयुः । अशीतिकाः पुरुषाः पञ्चाशतकाः स्त्रियो वा मातापितृव्यञ्जनाः स्थविरवर्षवराभ्यागारिकाश्चावरोधानां शौचाशौचं विद्युः, स्थापयेयुश्च स्वामिहिते ।


बाद मंत्रसभा का स्थान, फिर दरबार और तदनन्तर युवक राजकुमार, समाहर्त्ता-सन्निधाता आदि अध्यक्षों के प्रधान कार्यालय होने चाहिए । कक्ष्याओं के बीच-बीच में कंचुकी तथा अंतःपुररक्षकों की उपस्थिति रहे ।

( १ ) रनिवास के अंदर जाकर राजा किसी विश्वस्त बूढ़ी परिचारिका के साथ महारानी से मिले । अकेला किसी रानी के पास न जाये, क्योंकि ऐसा करने में कभी कभी बड़ा धोखा हो जाता है । कहा जाता है कि पहले कभी भद्रसेन नामक राजा के भाई वीरसेन ने उसकी रानी से मिलकर छिपे में भद्रसेन राजा को मार डाला था । इसी प्रकार माता की शय्या के नीचे छिपे हुए राजकुमार ने अपने पिता कारूश को मार डाला था । इसी प्रकार काशीराज की रानी ने धान की खीलों में मधु के बहाने विष मिलाकर अपने पति को मार डाला था । इसी भाँति विष में बुझे नूपुर के द्वारा वैरन्त्य राजा को और विष-बुझी करधनी की मणि से सौबीर राजा को, शीशे के द्वारा जालूथ राजा को और अपनी बेणी में शस्त्र छिपाकर विडूरथ राजा को, उनकी रानियों ने धोखे में मार डाला था । इसलिए रानियों से मिलते समय, राजा को इस प्रकार की अदृष्ट विपत्तियों से सावधान रहना चाहिए ।

( २ ) राजा को चाहिए कि वह मुंडी, जटी इसी प्रकार के अन्य धूर्त और बाहर की दासियों के साथ रानियों का संपर्क न होने दे । रानियों के सगे-संबंधी भी उन्हें प्रसव या बीमारी की अवस्था के अतिरिक्त न देखने पावें । स्नान, उबटन के बाद सुंदर वस्त्राभूषणों से अलंकृत होकर वेश्याएँ राजा के निकट जायें । अस्सी वर्ष की अवस्था के पुरुष तथा पचास वर्ष की बूढ़ी स्त्रियाँ माता-पिता की भाँति रानियों के हितचिंतन में रत रहें । अतःपुर के दूसरे वृद्ध तथा नपुंसक पुरुष रानियों के चरित्र का ध्यान रखें और उनको राजा की हितकामना में लगाये रखें ।