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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 136 of 918

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Page 136

५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

मिष्टमवेक्षेत वा । शासनमनिष्टमुक्त्वा बन्धवधभयाद्विसृष्टोऽप्यपगच्छेत् । अन्यथा नियम्येत ।

(१) प्रेषणं सन्धिपालत्वं प्रतापो मित्रसङ्ग्रहः ।
उपजापः सुहृद्भेदो दण्डगूढातिसारणम् ॥
बन्धुरत्नापहरणं चारज्ञानं पराक्रमः ।
समाधिमोक्षो दूतस्य कर्म योगस्य चाश्रयः ॥

(२) स्वदूतैः कारयेदेतत् परदूतांश्च रक्षयेत् ।
प्रतिदूतापसर्पाभ्यां दृश्यादृश्यैश्च रक्षिभिः ॥

इति कौटिलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे दूतप्रणिधिर्नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥


इस प्रकार के रहस्यों, कारणों और उद्देश्यों के सम्बन्ध में दूत अच्छी तरह से छान-बीन करे । रोके जाने के कारणों का ठीक-ठीक पता लग जाने पर वह उचित समझे तो रुके अन्यथा वहाँ से चल दें। अपने स्वामी की अभीष्ट-सिद्धि लिये वह चाहे तो उसी नगर में रुककर, गुप्त पुरुषों के द्वारा राजा तक सूचनाएँ पहुँचा कर, उनका प्रतीकार करवावे । अपने स्वामी का ऐसा संदेश, जिसको सुनकर शत्रुराजा क्रोधित हो उठे, सुनाने पर, दूत को बिना अनुमति लिये ही वहाँ से कूच कर देना चाहिए अन्यथा उसका पकड़ा जाना निश्चित है ।

( १ ) शत्रुप्रदेश में अपने स्वामी का संदेश लेकर जाना; शत्रुराजा का संदेश लाने के लिए जाना, सन्धिभाव को बनाये रखना, समय आने पर अपने पराक्रम को दिखाना, अधिक से अधिक मित्र बनाना, शत्रु के कृत्यपक्ष के पुरुषों को फोड़ देना, शत्रु के मित्रों को उससे विमुख कर देना, तीक्ष्ण, रसद आदि गुप्तचरों एवं अपनी सेना को भगा देना, शत्रु के बांधवों एवं रत्नों का अपहरण ( स्वायत्त ) कर लेना, शत्रु के देश में रहकर गुप्तचरों के कार्यों का निरीक्षण करना, समय आने पर पराक्रम दिखाना, सन्धि की चिरस्थिति के निमित्त जमानत-रूप में रखे हुए राजकुमार को मुक्त कराना और मारण, मोहन, उच्चाटन आदि का प्रयोग करना, ये सभी दूत के कार्य हैं ।

( २ ) राजा को चाहिये कि वह उपर्युक्त सभी कार्य दूतों के द्वारा करवाये और शत्रुओं के पीछे अपने दूतों या गुप्तचरों को लगाये रखे । अपने देश में तो वह शत्रुदूतों के कार्यों का पता प्रकट रूप से लगाये, किन्तु शत्रुदेश में उनकी सूचनायें गुप्तरूप से संग्रह करवाये ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में दूतप्रणिधि नामक पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ।

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