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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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प्रकरण ८## स्वविषये कृत्याकृत्यपक्षरक्षणम्
अध्याय १२

(१) कृतमहामात्यापसर्पः पौरजानपदानपसर्पयेत् ।
(२) सत्त्रिणो द्वन्द्विनस्तीर्थसभाशालापूगजनसमवायेषु विवादं कुर्युः—सर्वगुणसम्पन्नश्चायं राजा श्रूयते । न चास्य कश्चिद् गुणो दृश्यते यः पौर-जानपदान् दण्डकराभ्यां पीडयति इति ।
(३) तत्र येऽनुप्रशंसेयुः, तानितरस्तं च प्रतिषेधयेत्—मात्स्यन्याया-भिभूताः प्रजा मनुं वैवस्वतं राजानं चक्रिरे । धान्यषड्भागं पण्यदशभागं हिरण्यं चास्य भागधेयं प्रकल्पयामासुः । तेन भृता राजानः प्रजानां योग-क्षेमवहाः । तेषां किल्बिषं दण्डकरा हरन्ति, योगक्षेमवहाश्च प्रजानाम् ।


अपने देश में कृत्य-अकृत्य पक्ष की सुरक्षा

(१) राजा को चाहिए कि महामंत्री, मंत्री, पुरोहित आदि के समीप गुप्तचर नियुक्त करने के पश्चात् वह अपने प्रति प्रजाजनों तथा नगरनिवासियों का अनुराग-द्वेष जानने के लिए वहाँ भी गुप्तचरों की नियुक्ति करे ।

(२) पहिले तो गुप्तचर आपस में ही लड़ने-झगड़ने लगें; और बाद में वे तीर्थस्थानों, सभा-सोसाइटियों, खाने-पीने की दूकानों, राजकर्मचारियों के बीच, तथा नाना प्रकार के लोगों में यह कहकर वाद-विवाद करें कि 'यह राजा तो सर्वगुण-संपन्न सुना जाता है; किन्तु इसमें कोई भी सद्गुण नहीं दिखाई दे रहा है । उल्टा वह नगरवासियों को दण्ड देकर एवं कर वसूली करके पीड़ा पहुँचा रहा है ।'

(३) उसके बाद सुनने वालों की उचित-अनुचित प्रतिक्रिया को ताड़ता हुआ दूसरा गुप्तचर उसके विरोध में यों कहे—'देखो, जैसे छोटी मछली बड़ी मछली को खा जाती है, पुराकाल में वैसे ही बलवान लोगों ने निर्बल लोगों का रहना दूभर कर दिया था । इस अन्याय से बचने के लिए प्रजा ने मिलकर विवस्वान् के पुत्र मनु को अपना राजा नियुक्त किया; और तभी से खेती की उपज का छठा भाग, व्यापार की आमदनी का दसवाँ भाग तथा थोड़ा-सा सुवर्ण राजा के लिए कर रूप में निर्धा-रित भी कर दिया था । प्रजा के द्वारा निर्धारित भाग को पाकर राजाओं ने प्रजा के योगक्षेम का सारा दायित्व अपने ऊपर लिया । इस प्रकार ये निर्धारित दण्ड एवं कर प्रजा के उत्पीड़नों को दूर करने में सहायक होते हैं, और प्रजा की भलाई एवं कल्याण के कारण सिद्ध होते हैं । यही कारण है कि जंगलों में एकान्त जीवन बिताने