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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

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DevanagariHindipublished361 pages

Page 81 of 361

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समृद्धमिति काङ्कायनः ॥१३॥ ममाग्नेवर्च इति सात्रि-
कानग्नीन्दर्भपूतीकभाङ्गाभिः परिस्तीर्य गार्हपत्यशृतं
सर्वेषु सम्पातवन्तं गार्हपत्यदेशेऽश्नाति ॥१४॥ एवं पूर्व-
स्मिन्नपरयोरुपसंहृत्य ॥१५॥ एवं द्रोणकलशे रसानु-
क्तम् ॥१६॥५॥२२॥
यजूंषि यज्ञ इति नवशालायां सर्पिर्मधुमिश्रमश्नाति
॥१॥ दोषो गायेति द्वितीयाम् ॥२॥ युक्ताभ्यां तृतीयाम्
॥३॥ आनुमतीं चतुर्थीम् ॥४॥ शालामङ्गुलिभ्यां सम्प्रोक्ष्य
तो इससे समृद्धि होती है ऐसा काङ्कायन आचार्य्य कहते हैं॥१३॥ “ममा-
ग्ने वर्च०” इत्यादि से सात्रिक ( याज्ञिक ) अग्नियों को दर्भपूतिक भाङ्ग-
द्वारा परिस्तरण करके अर्थात् शत्रुदेश में जा कर गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि
और आहवनीय अग्नियों में कर्म करे । इसके अनन्तर गार्हपत्य अग्नि में
अभ्यातानान्त आहुति करके “ममाग्ने वर्च” इत्यादि से सारूपवत्स गौ के
दूध को गर्म कर पहिले उतार कर तब उत्तर तन्त्र करके पूतीक दर्भ
से स्तरण करे । तब अभ्यातानान्त करके सारूपवत्स दूध को अग्नि पर से
उतार के फिर आह्वनीयाग्नि के पास स्तरण करे । तब उसी सारूपवत्स
दूध को उतार कर इसी सूक्त से एकवार अभिमंत्रण करके खावे । तब
गार्हपत्य प्रभृति उत्तर तंत्र को करे । गार्हपत्य देश में भोजन करे । उत्तर
तंत्र, व्रतग्रहणादि करे । दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि, आहवनीयाग्नियों में
यथाक्रमसे व्रतग्रहणादि करे ॥ गार्हपत्याग्नि का स्तरण कुशों से, दक्षि-
णाग्नि का पूतीक काष्ठों से और भाङ्ग से आहवनीयाग्नि का स्तरण करे ॥
यह समुद्र कर्म समाप्त हुआ ॥१५॥१६॥५॥२२॥
यह बाईसवी कण्डिका पूरी हुई ॥२२॥
अब नूतन घर, गोशाला, अग्निशाला, या गाँव या पुर या अन्यत्र
अभिमत स्थानों में कर्मों को करे ॥ चाहे घर पत्थर, काठ, फुस,
या इंटों के बने हों सर्वत्र नये मकानों में गृह प्रवेश कर्म करे । घी, मधु
मिला करे । अर्थात् “यजूंषि यज्ञ” इत्यादि से आज्य द्वारा अंग होम
और प्रधान होम सर्पिष में मधु मिला कर करे ॥१॥ “दोषो गाय”० से
दूसरी, दोनों मंत्रों को मिला कर तीसरी, और “अनुमति सर्वम्”-इस
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