कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
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Read in contextअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ४७
प्रत्यग्नि परिचृतति ॥१९॥ तस्या अमावास्यायां तिस्रः
प्रादेशमात्रीरादधाति ॥२०॥ स्वे क्रतुमिति रसप्राशनी
॥२१॥ रसकर्माणि कुरुते ॥२२॥ स्तुष्व वर्ष्मन्निति प्राजा-
पत्यामावास्यायामस्तमिते वल्मीकशिरसि दर्भांवस्तोर्णेऽ-
ध्यधिदीपं धारयंस्त्रिर्जुहोति ॥२३॥ तण्डुलसंपातानानीय
रसैरुपसिच्याश्नाति ॥२४॥ एवं पौर्णमास्यामाज्योतान्
॥२५॥४॥२१॥
ऋधग्द्व्यन्त्रस्तदिदासेति मैश्रधान्यं भृष्टपिष्टं लोहि-
तालंकृतं रसमिश्रमश्नाति ॥१॥ अभृष्टं प्लक्षोदुम्बरस्यो-
त्तरतोऽग्नेस्त्रिषु चमसेषु पूर्वाह्नस्य तेजसाग्रमन्नस्य
प्राशिषमिति पूर्वाह्ने ॥२॥ मध्यन्दिनस्य तेजसा मध्य-
वृक्ष की शाखा से गौ आदि के भागों को लेकर देवे ॥१८॥ विभक्त हुए
पुत्र गण अपने २ घरों में प्रति अग्नि में शान्तवृक्ष की शाखा को बान्धे
॥१९॥ उस शाखा की तीन समिधाओं को ( प्रादेश परिमिता ) अग्नि में
डाले ॥२०॥ “त्वे क्रतु०” इत्यादि से रसास्तनपा प्राशन्तः रसा अनया
प्राश्यन्ते । रस कर्मों को इसी से करे ॥२२॥ “स्तुष्व वर्ष्मन्०” इत्यादि
की देवता प्रजापति है। इस ऋचा से अमावास्या को सूर्य्य के अस्त
होने पर दीमक की मट्टी के ढेर पर कुशों को बिछाकर उस पर खपर
धरकर उसमें अग्नि स्थापन करे और दीप जला देवे, और तीन बार
आहुतियां देवे ॥२३॥ चावल के सम्पातों को लाकर रसों से उसका उप-
सेचन कर खावे ॥२४॥ और पौर्णमासी को आज्य से उपसेचन कर
खावे ॥२५॥४॥२१॥ यह इक्कीसवी कण्डिका समाप्त हुई ॥२१॥
‘ऋधग्द्व्यन्त्रस्तदिदास०” इत्यादि मंत्र से मैश्रधान्य को भूनकर उसके
सत्तू को लोहित ( रक्तचन्दन या लाल 'शोभांज वृक्ष ) से अलंकृत
रस को मिलाकर खावे ॥१॥ बिना भूने हुए मिश्रधान्य के सत्तू को
अग्नि के उत्तर भाग में लक्ष, गूलर के तीन चमसों को पूर्वाह्न समय
“पूर्वाह्नस्य तेजसाग्रमन्नस्य प्राशिषम्” इत्यादि से आहुति देवे ॥२॥