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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

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DevanagariHindipublished361 pages

Page 76 of 361

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Page 76

४४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।

बृहस्पतिः। यथासदद्बहुधान्यमयदमं बहुपूरुषमिति फाल-
मतिकर्षति ॥५॥ इरावानसि धार्तराष्ट्रे तव मे सत्रे
राध्यतामिति प्रतिमिमीते ॥६॥ अपहताः प्रतिष्ठा इत्य-
पूपैः प्रतिहत्य कृषति ॥७॥ सूक्तस्य पारं गत्वा प्रयच्छति
॥८॥ तिस्रः सीताः प्राचीर्गमयन्ति कल्याणीर्वाचो वदन्तः
॥९॥ सीते वन्दामहे त्वेत्यावर्तयित्वोत्तरस्मिन् सीता-
न्ते पुरोडाशेनेन्द्रं यजते ॥१०॥ अश्विनौ स्थालीपाकेन ॥११॥
सीतायां संपातानानयन्ति ॥१२॥ उदपात्र उत्तरान् ॥१३॥
शष्पहविषामवधाय ॥१४॥ सर्वमनक्ति ॥१५॥ यत्रसंपा-
तानानयति ततो लोष्टं धारयन्तं पत्नी पृच्छत्यकृक्षतेति
॥१६॥ अकृक्षामेति ॥१७॥ किमाहार्षीरिति ॥१८॥ वित्तिं
भूतिं पुष्टिं प्रजां पशूनन्नमन्नाद्यमिति ॥१९॥ उत्तरतो मध्य-


फालम्०” इत्यादि से फाल को अभिमंत्रित करे ॥५॥ “इरावानसि०”
इत्यादि से खेत को नाप कर जोते ॥६॥ “अपहताः प्रतिष्ठा०” इत्यादि से
फाल को अपूपों से वेष्टित कर जोते ॥ अपूप घी में पका हो । “लांगलं
पवीरवत्” इत्यादि मंत्र पढ़कर जोते ॥७॥ और कर्त्ता हल को कर्षकों
को देवे-तब तक स्वयं जोते जब तक पूरा सूक्त पढ़ना समाप्त न हो ॥८॥
“अभिवर्षतु निष्पद्यतां बहुधान्यं, आरोग्यम्” इत्यादि कल्याणी बातों को
बोले जब तक तीन सीरावर पश्चिम की ओर जोते ॥९॥ “सीते वन्दा-
महे त्वं०” इत्यादि मंत्र को जाप करते हुए लोट पोट करता रहे तब तक
पुरोडाश से इन्द्रदेवता की पूजा करे ॥१०॥ “अश्विनौ०” देवता को
स्थालीपाक से पूजा करे ॥११॥ सीरावरों पर आहुतियों का घार देवे
॥१२॥ जलपात्र को उत्तर दिशा में घरे ॥१३॥ शल्य ( हरी दूब ) की
आहुति करके सब हलों को प्रक्षालन करे ॥ जहां सम्पातों को लावे वहां
से ढेला लेते हुए को पत्नी पूछे तुमने जोता ? कारयिता कहे मैं सम्पातों
को जोतता हूं । मट्टी के पिण्ड को लेकर घरे पत्नी (स्वामिनी) पूछे “अकृ-
ष्याम०”१४।१५।१६।१७। फिर पत्नि पति को पूछे “किमाहार्षीः” तो उत्तर
में पत्नी कहे-वित्ति, भूति, पुष्टि, प्रजा, पशु, अन्न, और अन्नाद्य इनको