कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
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Read in contextहरितबर्हिषमश्नाति ॥२०॥ अन्वक्ताः प्रादेशमात्रीराद-
धाति ॥२१॥ नाव्ययोः सांवेद्ये पश्चादग्नेर्भूमिपरिलेखे
कीलालं मुखेनाश्नाति ॥२२। तेजोव्रतं त्रिरात्रमश्नाति
॥२३॥ तद्दक्षः ॥२४॥ शम्भुमयोभुभ्यां ब्रह्मजज्ञानमस्य
वामस्य यो रोहित उदस्य केतवो मूर्द्धां विषासहिमिति
सलिलैः क्षीरौदनमश्नाति ॥२५॥ मन्थान्तानि ॥२६॥
द्वितीयेन प्रवत्स्यन् हविषामुपदधीत ॥२७॥ अथ प्रत्येत्य
॥२८॥ अथ प्रत्येत्य ॥२९॥ अथ प्रार्थयमाणः ॥३०॥
अथ प्रार्थयमाणः ॥३१॥ चत्वारो धायाः पलाशय-
वस्त्र को लोहदण्ड के साथ जल में डाल देवे ॥ “एता एना०” इस ऋचा
से नील वस्त्र को लोह खण्ड के साथ जल में फेंककर घर को आवे ॥
तब पौष्टिक और सम्पादन कर्मों को करे ॥ निर्ऋति कर्म समाप्त हुआ ॥
“त्रिषप्रीयं०” इत्यादि सूक्त से पौष्टिकादि कर्मों को चैत्र की पौर्णमासी
को या चित्रा नक्षत्र में करे ॥१९॥ पक्षि के घोंसले को जलाकर पक्व
स्थालीपाक को गर्म करके हरे कुश के साथ खावे ॥२०॥ प्रादेश बरा-
बर समिधाओं को जल में भिंगो कर आधान करे ॥२१॥ जिन दो
नदियों में नौकायें आती जाती हों, उनके संगम पर अग्नि धर कर
उसके पश्चिम भाग में भूमि पर रेखा करके परशु की भाँति मुख करके
खावे हाथ से नही ॥२२॥ और तीन रात तक नित्य घी खावे ॥२३॥
उसको खाने वाला ‘शम्भुमयोभुभ्यां०” इत्यादि सलिल गण के मंत्रों से
.क्षीरौदन खावे ॥२५॥ मन्थान्त कर्मों को “त्रिः ज्योतिः कुरुते०” से
करे ॥२६॥ “ब्रह्मजज्ञानमवाप्ता”० इत्यादि से राह चलता मन्थान्त कर्मों
को उपवास रहता हुआ हविष द्वारा आहुति करता हुआ करे ॥२७॥ जब
मार्ग में जावे तब यह कर्म करे। जब गाँव जावे तब यह कर्म करे ॥
यह प्रस्थान-कर्म समाप्त हुआ ॥२८॥२९॥ यथार्थ याचना करने वाला
द्रव्य की कामना से यह कर्म करे॥ या निष्काम भी यह कर्म करे ॥३०॥
॥३१॥ अब समुद्र कर्म (सर्व फल कर्म) को कहेंगे ॥ अभ्यातानान्त
कर्म करके चार फूलका पलाश की समिधाओं का, चार कुशों का फूल का
बारी २ से (एक समिद्धारक, दूसरी उस पर दर्भ भारक) फिर उसी