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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

DevanagariHindipublished361 pages

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( १३ )
ज्वर के साथ बहुत मिलते हैं । प्रधान लक्षण पर्याय क्रम से उत्ताप और
शीतावस्था, ज्वर को छोड़ कर और दो तीन दिन अन्तर देकर
ज्वर होना । ज्वर के साथ मस्तक व्यथा, खांसी बलास ( क्षय रोग )
पामन् (तक्षण का भाई, चूलकना ) और पाण्डु ( कामला ) आकर योग
देता है । उत्ताप ज्वर का प्रधान लक्षण होने से उल्लिखित हुआ है।
१ का० १२ सू० में “विद्युत्को” जान पड़ता है अग्नि का रूपान्तर कहा
है, ज्वर, माथा व्यथा, काश के कारण होने से निर्दिष्ट हुआ है। ज्वर
दूर करने के लिये मंत्रोच्चारण और कुष्ठ नामक ( Costus specios
or arabicus ) वृक्ष के यंत्र धारण की व्यवस्था सूचित हुई है। कौशिक
सूत्र में और भी अनेक आनुषङ्गिक प्रक्रिया वर्णित हुई है; विस्तार भय
से उन विषयों का उल्लेख नही किया गया । कौ० सू० सानुवाद में देखना
(३५ सू०)। सोने का यंत्र एक सौ वर्ष परमायु और प्रभुत शक्ति लाभार्थ
धारण करना चाहिये ऐसा लिखा है ।
॥ द्वितीय काण्ड ॥
३ रा सू० प्रथमकाण्ड दूसरा सू० देखो । चतुर्थ सू० विभिन्न रोग
और भूत योनि के लिये “जङ्गिड” नामक वृक्ष को उपलक्ष कर मंत्र ।
टीकाकारगण इस जङ्गिड वृक्ष के स्वरूप को अब तक निश्चय नहीं कर
पाये । सीधे लिखा है “वाराणस्यां” प्रसिद्धः ।—काशी में मशहूर है । १४
काण्ड ३४ सू० में और १९ काण्ड १५ सूक्त में इस सम्बन्ध में और भी
दो मंत्र है । ८ म० सू० क्षेत्रिय ( Hereditaridiseases, Pulmon
ary consumption Greffiths—इसका अनुवाद रामक रोग का मंत्र
इस रोग को टीकाकारगण पुरुषानुक्रमसे प्राप्त यक्ष्मा रोग कहकर निर्देश
किया है । इस यक्ष्मा रोग के सम्बन्ध में अनेक मंत्र हैं । तीसरे
काण्ड में ६ ठा सू० में हरिण के शृङ्ग के यंत्र की व्यवस्था है । १९
काण्ड में ३९ सू० में कुष्ठ वृक्ष को अन्य २ रोगों में यक्ष्मा को आरोग्य
करने के लिये प्रस्तुत हुआ है । ९ सूक्त अथर्ववेद में अनेक स्थलों में
भूतयोनि, अप्सरा, गन्धर्व प्रभृति अमानुषिक प्राणिको रोग के कारण
कहकर निर्देश किया है ( ६।३७ ) इस सू० में यह सब भूत योनि के
आक्रमण से रोगी की रक्षा करने के लिये दश प्रकार के वृक्षों का यंत्र
धारण करने की व्यवस्था की है । २५ सू० पृश्निपर्णी ( Hemianitis
Cordifolia ) वृक्ष के प्रति मंत्र । रोग के हेतुभूत कण्वनामक दैत्य