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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

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DevanagariHindipublished361 pages

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( ११ )
( Internal application ) विशेष उल्लेख अथर्ववेद में भी पाया
जाता । ये सब भेषज गले में, हाथ में, शरीर के अन्य स्थान में यंत्र
( या तागा परिहस्त वलय ) बन्धन किया जाता है। कौशिकसूत्र में इस
प्रकार बन्धन के साथ अन्य २ द्रव्य सेवन करने की व्यवस्था भी है।
जैसे—कौशिकसूत्र २५।६।९, २०।१०।१९, २९।२८।२९ इत्यादि । धातु
घटित औषधों में भूतयोनि को भगाने के लिये सीसा का यंत्र ( १ का०
सू० ६ ) और एक सौ वर्ष परमायु और प्रभूत शक्ति पाने के लिये सोने
का यंत्र ( १ का० सू० १६ ) धारण करने की व्यवस्था है। चिकित्सा
शास्त्रों के इतिहास की आलोचना करने से जाना जाता है जो पहिले
औषधों का बाहरी व्यवहार ( external application ) और पीछे
अभिज्ञता की वृद्धि के साथ २ भीतरी व्यवहार ( Internal admini-
stration ) हो जाता है। पहिले हाथ या गले में धारण, पीछे मालिस
या प्रलेप रूप से व्यवहार और शेष में औषध रूप से अति सूक्ष्म मात्रा
में सेवन, इसी प्रकार औषध सेवन का क्रम विकाश संघटित हो जाता
है। हम लोग अथर्ववेद में औषधियों को बाहर धारण में हिन्दू चिकि-
त्सा के पहिले उन्मेष देखने में आता है। जिन भेषजों का ( जैसे—
अश्वत्थ, खैर, हरिद्रा, अपामार्ग, मुञ्ज, शमी, पृश्निपर्णी इत्यादि ) यंत्रों या
बूटियों या औषधों को अथर्ववेद में बाहरी ( शरीर के किसी भाग में )
भाग में धारण करना बतलाया है। पीछे उन्हीं सब भेषजों को औषधि
रूप से सेवन की व्यवस्था बतलाई गई। धातुओं में से सीसा और
स्वर्ण की अथर्ववेद में शरीर के बाहरी भाग में धारण करने की व्यवस्था
है। पीछे के तन्त्र ग्रन्थों में ये दोनों एवं अन्यान्य धातुओं के भस्म
औषध रूप से सेवन करने की व्यवस्था हुई है। निम्नलिखित कई एक
पृष्ठों में अथर्ववेद के प्रत्येक काण्डों में जो सब रोग और भेषज मूलक
सूक्त हैं, उनका अति सूक्ष्म विवरण दिया गया है।
प्रथम काण्ड ॥ १ ॥
दूसरा सू०। देह से अत्यधिक स्राव ( उदरामय, आमाशयादि ) निवा
रण के लिये मुञ्जघास लेकर मंत्र ) २तीय काण्ड में ३रे सू० में इसी उद्देश्य
से “झरना का जल लेकर और एक मंत्र है। छठा काण्ड में ४४ सू० में
और भी एक मंत्र है। मुञ्जघास को यंत्र रूप से बांधने की प्रक्रिया कौशिक
सू० में ( २५।६ ) और दारिल की टीका में विस्तृत भाव से लिखा है।