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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

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DevanagariHindipublished361 pages

Page 182 of 361

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Page 182

१५० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मनुपरियन्ति ॥२॥ प्रतिदिशं ध्रुवेयं विराडित्युपतिष्ठन्ते
॥३॥ पितेव पुत्रानित्यवरुह्य भूमिन्तेनोदकार्थान्कुर्वन्ति
॥४॥ पवित्रैः संप्रोक्षन्ते ॥५॥ दर्भाग्राभ्यां चर्महविः संप्रो-
क्षति ॥६॥ आदिष्टानां सानजानस्यै प्रयच्छति ॥७॥ तां-
स्त्रेधा भाग इति व्रीहिराशिषु निदधाति ॥८॥ तेषां यः
पितॄणां तं श्राद्धं करोति ॥९॥ यो मनुष्याणां तं ब्राह्मणान्
भोजयति ॥१०॥ यो देवानां तमग्ने सहस्वानिति दक्षि-
णं जान्वाच्यापराजिताभिमुखः प्रह्वो वा मुष्टिप्रसृता-
ञ्जलिभिः कुम्भ्यां निर्वपति ॥११॥ कुम्भ्या वा चतुः ॥१२॥
तान्सप्त मेधानिति सापत्त्यावभिमृशतः ॥ १३ ॥ गृह्णा-
मि हस्तमिति मन्त्रोक्तम् ॥१४॥ त्रयो वरा इति त्रीन्व-
रान् वृणीष्वेति ॥१५॥ अनेन कर्मणा ध्रुवानिति प्रथमं
उपस्थान उसका नाम लेवे ) करे । चार ऋचाओं से उद्पात्र को अनु-
मंत्रण करे ॥२॥ “प्रतिदिशं ध्रुवेयं विराट्०” से उपस्थान करे। “पितेव
पुत्रान्०” से चढ़कर भूमि को उदक कलश को धरे इसी से सब कार्य
होंगे ॥४॥ पवित्रे द्वारा संप्रोक्षण करे ॥५॥ दर्भाग्रों से चर्म हवि को
संप्रोक्षण करे ॥६॥ तब बैल के चर्म पर व्रीहि को तीन भागों में करे।
देव, मनुष्य, पितृ, पत्नी विना जाने ही देवे। कर्त्ता प्रैष द्वारा देवे। व्रीहि
को विभागों पर धरे “त्रेधा भागो निहितः” त्रिभिः पादैः से अनुमंत्रण
करे ॥७॥८॥ जो पितृ भाग है उससे अवभृथ के अन्त में वृद्धिश्राद्ध करे।
जो मनुष्यों का भाग है उसको ब्राह्मणों को जमावे ॥१०॥ जो देवताओं
का भाग है उसको “अग्ने सहस्वान्०” से दहिनी जंघा टेक कर पश्चिम
मुख हो निहुड़कर मुट्ठी—दोनों हाथ की अंजली फैलाकर कुम्भ्या में
निर्वाप करे ॥११॥ या कुम्भी में चार अञ्जुलि डाले ॥१२॥ “तान्सप्त
मेधान्०” से पति के साथ पत्नी अभिमर्शन करे ॥१३॥ पति पत्नी के
हाथ को “गृह्णामि हस्तं०” से पकड़े ॥१४॥ “त्रीन्वरान् वृणीष्व०” से
दाता प्रैष को देकर पत्नी को देवे। “तौ वृणन्तौ त्रयो वरा०” इस आधी
ऋचा से प्रतिपत्नी अनुमंत्रण करे। दाता सब कर्मों में समृद्धि द्वारा