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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

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DevanagariHindipublished361 pages

Page 180 of 361

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Page 180

१४८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
पुँलिङ्गैर्दातारं स्त्रीलिङ्गैः पत्नीम् ॥१५॥ उदहृत्सम्प्रैषव-
र्जम् ॥१६॥ अथ देवयजनम् ॥१७॥ यद्यत्समं समूल-
मविदग्धं प्रतिष्ठितं प्रागुदक्प्रवणमाकृतिलोष्टवल्मीकेना-
स्तीर्य दर्भैश्च लोमभिः पशूनाम् ॥१८॥ अग्ने जायस्वेति
मन्थन्तावनुमन्त्रयते ॥१९॥ पत्नी मन्त्रं सन्नमयति ॥२०॥
यजमानं च ॥२१॥ कृणुत धूममिति धूमम् ॥२२॥ अग्ने-
ऽजनिष्ठा इति जातम् ॥२३॥ समिद्धो अग्न इति समि-

दाता को अनुमंत्रण करे ॥१५॥ उदहृत् के संप्रैष को छोड़ कर ॥१६॥
अब देव यजन के विषय में कहेंगे ॥१७॥ जो भूमि सम हो, समूल हो,
जहाँ कुछ जलाया नहीं गया हो, प्रतिष्ठित हो, पूर्व, उत्तर को ढालुआ
हो, जोते खेत की मट्टी और दीमक मट्टी से बराबर कर पशुओं के
बाल तथा रोमों को बिछावे ॥१८॥ अब सब यज्ञों के विधान को कहेंगे।
सम्भारों को इकट्ठा कर लेने पर-उत्तरायण सूर्य के होने पर ऋषिगुण
युक्त ऋत्विजों का वरण करे ॥ यह ऋत्विक् कल्प हुआ। मधुपर्क कहा
जा चुका। एकादशी तिथि में वरण करके गोदानिक विधान से केश,
श्मश्रु, नखों को बनवाकर और पत्नी केशों को छोड़ कर नखों को बनवा
लेवे। स्नान कर अखण्ड नये वस्त्र पहन ओढ़कर तय्यार होवे और सुगन्ध
पदार्थों से युक्त होकर दाता उपनयन के समान दण्ड, मेखला और
यज्ञोपवीती होकर पत्नी के साथ तीन रात्रि दीक्षा ग्रहण करे। अग्नि के
लिये, ब्राह्मण के लिये और गुरु वा आचार्य के लिये व्रतों को सुन कर
तब व्रतादानीय आठ समिधाओं को आधान करे। तब कर्त्ता अभ्याता-
नादि उत्तरतंत्र करे। हविष्य भक्षणादि कर्त्ता, कराने वाला और पत्नी
करे। अब चतुर्दशी को प्रातःकाल यज्ञोपवीती होकर शान्तिजल को
करके देवयजन को संप्रोक्षण करके जोते खेत की मिट्टी और दीमक की
मिट्टी से वेदि को बराबर कर दर्भों, गौ, अश्व, भेड़ क लोमो से वेदि
का आस्तरण करके पलाश की दो अरणियों से अग्नि को यजमान मन्थन
करे। "अग्ने जायस्व०" ऋचा से ॥१९॥ पहिली आधी ऋचा में पत्नी
एवं यजमान का नाम ग्रहण करे। पत्नी मंत्र को संयमन करे और यज-
मान को भी ॥२०॥२१॥ "कृणुत धूमं०" से धूम को ॥२२॥ "अग्नेऽज-