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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

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DevanagariHindipublished361 pages

Page 166 of 361

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Page 166

१३४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
परिवप नखानि च कुर्विति ॥१॥ पुनः प्राणः पुनर्मैत्वि-
न्द्रियमिति त्रिर्निर्मृज्य ॥ २॥ त्वयि महिमानं साद-
यामीत्यन्ततो योजयेत् ॥३॥ अथैनमुप्तकेशश्मश्रुं कृत्त-
नखमाप्लावयति ॥ ४ ॥ हिरण्यवर्णा इत्येतेन सूक्तेन
गन्धप्रवादाभिरलङ्कृत्य ॥ ५॥ स्वक्तं म इत्यानक्ति ॥
६॥ अथैनमहतेन वसनेन परिधापयति परिधत्तेति
द्वाभ्याम् ॥ ७॥ एह्यश्मानमातिष्ठेति दक्षिणेन पादे-
नाश्ममण्डलमास्थाप्य प्रदक्षिणमग्निमनुपरीणीय ॥ ८ ॥
अथास्य वासो निर्मुष्णाति यस्य ते वास इत्येतया ॥९॥
अथैनमपरेणाहतेन वसनेनाच्छादयत्ययं वस्ते गर्भं
पृथिव्या इति पञ्चभिः ॥ १० ॥ यथा द्यौर्मनसे चेतसे
धिय इति महाव्रीहीणां स्थालीपाकं श्रपयित्वा शान्त्यु-
दकेनोपसिच्याभिमन्त्र्य प्राशयति ॥ ११ ॥ प्राणापाना-
रोमों को बनाओ और नखों को काटो ॥१॥ “पुनः प्राणः” इत्यादि से
तीन बार मार्जन करके ॥२॥ “त्वयि महिमानं सादयामि०” इत्यादि
पुनः केशों को काटने के लिये नापित को क्षुरा साफ कर देवे ॥३॥ अब
इस केशादि कटवाये बालक को स्नान करावे ॥४॥ “हिरण्यवर्णा०”
इत्यादि सूक्त से कलशोदक को अभिमंत्रण करके “यस्ते गन्ध” तीन
ऋचा से बालक को नहवावे और गन्ध पुष्प को अभिमंत्रण कर लेवे
॥५॥ “स्वक्तं म०” से दो आँखों में अञ्जन लगावे ॥६॥ और अखण्ड नये
वस्त्र को “परिधत्त” इस दो ऋचाओं से पहनावे ॥७॥ “एह्यश्मानमातिष्ठ०”
इत्यादि दक्षिण पग को पत्थर पर स्थापन करे और अग्नि की प्रदक्षिणा
कर ऐसा करे ॥८॥ अब इस “यस्य ते वास०” ऋचा से ओढ़ने के
वस्त्र को देवे ॥९॥ अब इस बालक को दूसरे वस्त्र से ( जो नया हो )
आच्छादन करे । “अयं वस्ते गर्भं पृथिव्या०” इन पांच ऋचाओं से
॥१०॥ “यथा द्यौर्मनसे चेतसे धिय०” से महाव्रीहियों के स्थालीपाक
को पका कर शान्ति जल सेचन कर अभिमंत्रण करके प्राशन करावे
॥११॥ “प्राणापानौ ओजोऽसि०” से आज्य की आहुति करे । समिध का