कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
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प्रस्तावना ।
प्रायः मनुष्यमात्र अनादि काल से यह विचार करते आते हैं कि
यह संसार क्या है, यह कब और कैसे बना, और कब, कैसे नष्ट होगा ।
इस विषय में अनेकों मतभेद होते हुए भी सब विद्वान् एक ही बात में
सहमत हैं कि ज्ञान की पहिली पुस्तक जो अब ही तक उपलब्ध हुई है
वह वेद है और वेद के विद्वान् इस पुस्तक को सृष्टि विज्ञान की पूर्ण
पुस्तक मानते हैं और उनका दावा है कि मनुष्य की जो उन्नति होती है,
हुई है और होगी वह सब इसी वैदिकविज्ञान के आश्रय से है । संसार
में मानव सभ्यता के प्राचीनतम काल से लेकर पाश्चात्य वैज्ञानिक
आविष्कारों के युग तक समस्त विज्ञान का आधार भूमण्डल में केवल
चार ही वस्तु हैं । वे हैं जल, अग्नि, वायु, और मिट्टी । इन्हीं चारों
पदार्थों के स्थूल और सूक्ष्म ज्ञान को वेद कहते हैं । ज्ञान दो प्रकार का
है एक प्रत्यक्ष जिसको लौकिक या दृष्टवाद और दूसरा अलौकिक या
अदृष्टज्ञान कहते हैं । भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक इनमें भूलोक से
लेकर स्वर्ग तक तीन लोकों की सृष्टि होती है और इन्हीं तीनों का प्रलय
भी होता है । बाकी १४ लोकों या १४ भुवनों में से ११ का पाञ्चभौतिक
लोकों से प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है और इनमें से सायंस ( विज्ञान ) और
पदार्थों में शक्ति या गुण क्यों है ? इसका ज्ञान दर्शनशास्त्र ( अध्यात्म
शास्त्र ) से होता है । ये दोनों प्रकार के ज्ञान वेद से होता है ।
वेद चार क्यों हैं ? अधिक या कम क्यों नहीं ? इसका उत्तर अग्नि,
जल, वायु और पृथिवी इन्हीं चार भिन्न २ पदार्थों की अलग २ शक्तियाँ
स्थूल और सूक्ष्म का ज्ञान वेदों से होता है इसलिये अग्नि का ज्ञान पूर्ण
रूप से ऋग्वेद से, यजुर्वेद से, वायु के प्रकार कार्य्य इत्यादि जाने जाते
हैं । सामवेद से जल सम्बन्धी सारी बातों का पूर्ण ज्ञान होता है और
अथर्ववेद से यही पृथिवीतत्व का पूर्णतया ज्ञान होता है । इसीलिये
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद इस प्रकार चार वेद हैं ।