कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
Page 116 of 361
Read in context८४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
यथेदं भूम्या अधि यथा वृक्षं वाश्वं मे यथार्यं वाह इति
संस्पृष्टयोर्वृक्षलिबुजयोः शकलावन्तरेषुस्थकराञ्जनकुष्ठ-
मधुघरेषममथिततृणमाज्येन संनीय संस्पृशति ॥ २१ ॥
उत्तुदस्त्वेत्यङ्गुल्योपनुदति ॥२२॥ एकविंशतिं प्राचीन-
कण्टकानलङ्कृताननूक्तानादधाति ॥२३॥ कूदीप्रान्तानि
ससूत्राणि ॥२४॥ नवनीतान्वक्तं कुष्ठं त्रिरहः प्रतपति
त्रिरात्रे ॥२५॥ दीर्घोल्पेऽवगृह्य संविशति ॥२६॥ उष्णो-
दकं त्रिपादे पत्तः प्रबद्धाङ्गुष्ठाभ्यामर्दयञ्छते ॥२७॥ प्रति-
कृतिमावलेशनीं दाम्भ्यूषेण भाङ्गुज्येन कण्टकशल्कयोलू-
सुरा, प्रपा को लाकर अभिमंत्रण कर प्रजा की कामना वाली को देवे ॥१९॥
वन्ध्या का प्रजागर्भकर्म समाप्त हुआ ॥ १९ ॥ अब सीमन्तोन्नयन कर्म
को कहते हैं ॥ गर्भ से अष्टम मास में यह कर्म करना चाहिये "अव्यच-
सश्च०" इत्यादि से अभ्यातानान्तकर्म करके "यौ ते माता०" इत्यादि गर्भ-
सूक्त से आज्य की आहुति करके श्वेत और पीले सर्षप की रक्ष-पुट्टलिका
बना कर सम्पात और अभिमंत्रण करके शुभ दिन के अन्तमें गर्भिणी
के गले में पहना देवे; जो उसकी नाभि तक लटकती रहे ॥२०॥ दो सटे
हुए वृक्षों के छाल, तगर, शरखण्ड, अञ्जन, कुष्ठ, जेठीमधु, वातसंभ्रम
तृण इन पदार्थों को आज्य से आलोडन कर "यथेदं भूम्या अधि०"
इत्यादि सूक्त से गर्भिणी के सारे शरीर में लगावे ॥२१॥ "उत्तुदस्त्व०"
से अङ्गुली से भार्य्या के उदर और पीठ को पीड़ित करे (काम में रुचि
होने के लिये) ॥२२॥ पुराने मदनी के २१ कांटे पूर्वाग्र कर अलंकृत
करके एकही बार में लेकर आधान करे ॥२३॥ और २१ ही बैर के प्रान्त
भाग को लाख के लाल रंग में सूत्र को रंग कर उसे गर्भिणी को बान्धे
॥२४॥ उत्पल कुष्ठ को मक्खन से चपोड़ कर दिन में तीन बार पूर्वाह्ण,
मध्यान्ह और अपराण्ह समय तपा २ कर आधान करे और इसी प्रकार
तीन बार रात में करे ॥