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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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दशम लम्बक १२७
'घर का मोह व्यर्थ है। क्योंकि घर में स्त्री ही एक बन्धन है। उन स्त्रियों की भी
जब यह दशा है, तब घर से अच्छा एकान्त जंगल ही है' ॥१८॥
ऐसा निश्चय करके और उस राजकन्या को भी उसी वृद्धा के घर पर ही छोड़कर धनदेव
बनिया कहीं दूर वन के लिए चल पड़ा ॥१९॥
मार्ग में जाते हुए उसे रुद्रसोम नाम का एक ब्राह्मण मिला जो उसका मित्र बन गया।
वह भी बहुत दिनों बाद लम्बे प्रवास से घर आ रहा था ॥११०॥
बनिये से उसकी स्त्री के वृत्तान्त को सुनकर वह ब्राह्मण भी अपनी स्त्री पर शंका करता
हुआ उसी बनिये के साथ सायंकाल अपने गाँव पहुँचा ॥१११॥
अपने घर के पास नदी में एक ग्वाले को आते हुए देखकर उसने हँसी-हँसी में
उससे पूछा—॥११२॥
'ग्वाले क्या कोई युवती स्त्री तुमसे प्रेम करती है जिस कारण संसार को तृण के समान
समझकर इस प्रकार की मस्ती में तुम गा रहे हो ? ॥११३॥
यह सुनकर वह ग्वाला हँसा और बोला— मैं कहाँतक छिपाऊँ। लम्बे समय से विदेश
गये हुए गाँव के चौधरी रुद्रसोम नामक ब्राह्मण की युवती भार्या है, मैं उसी का सेवन
करता हूँ उसकी दासी स्त्री का वेष पहनाकर मुझे उसके घर ले जाती है। ग्वाल से यह सुनकर
और क्रोध को भीतर-ही-भीतर पीकर सच्चाई को जानने की इच्छा से रुद्रसोम ने ग्वाले से
कहा— ॥११४-११६॥
'यदि ऐसी बात है, तो आज मैं तेरा मेहमान हूँ। अतः अपना वेष मुझे दे दो तो तुम्हारी
तरह आज मैं वहाँ जाऊँ। मुझे बहुत कौतुक हो रहा है' ॥११७॥
'ऐसा करो यह मेरा काला कम्बल ले लो। लाठी भी ले लो और तबतक यहाँ बैठो
जबतक दासी यहाँ आती है। ग्वाले ने उससे इस प्रकार कहा ॥११८॥
और कहा कि—'मेरे भ्रम में दासी तुम्हें स्त्री के कपड़े पहनने को देगी। स्त्री वेष
धारण कर रात में तू वहाँ जाना और मैं आज की रात विश्राम करूंगा ॥११९॥
इस प्रकार कहते हुए ग्वाले से लाठी और कम्बल लेकर वह रुद्रसोम उसी वेष में
बैठा रहा ॥१२०॥
वह ग्वाला धनदेव बनिया के साथ कुछ दूर पर जा बैठा और इतने में ही वहाँ दासी
आ पहुँची ॥१२१॥
उसने चुपचाप आकर अँधेरे में धुर बैठे रुद्रसोम को याराना (ग्वाला) समझकर उस
स्त्री का वेष धारण कराकर कहा—जाओ ॥१२२॥