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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक ४७
अब व्यर्थ चिन्ता और शोक मत करो। जो होना है, उसे ब्रह्मा भी नहीं बदल
सकते' ॥२३६॥
वानर ने यह सुनकर और शोक एवं मोह को छोड़कर निश्चयदत्त विरक्त भाव से शिव
की शरण में चला गया ॥२३७॥
तदनन्तर वन में उस बन्दर के साथ रहते हुए निश्चयदत्त के पास एक बार दैव योग से
मायंदा नाम की तपस्विनी आई। उसने प्रणाम करते हुए निश्चयदत्त से पूछा कि तुम्हारे मनुष्य
होते हुए भी यह तुम्हारा मित्र बानर कैसे हुआ यह आश्चर्य है! ॥२३८-२३९॥
तब निश्चयदत्त ने पहले अपना और बाद बानर का समाचार सुनाकर उस तपस्विनी
से दीनतापूर्वक कहा— यदि आप कोई प्रयोग या मन्त्र जानती हैं तो मेरे मित्र को पशुता से
बचाइए ॥२४०॥
निश्चयदत्त की प्रार्थना सुनकर मायंदा योगिनी ने उसे स्वीकार कर, मन्त्र की युक्ति से
बन्दर के गले का डोरा खोल दिया। उसके खोलते ही सोमस्वामी बन्दर-रूप छोड़कर उसी क्षण
अपने यथार्थ मनुष्य-रूप में आ गया ॥२४१॥
तदनन्तर, वह दिव्य प्रभाववाली मायंदा के बिजली के समान अन्तर्धान हो
जाने पर निश्चयदत्त और सोमस्वामी दोनों उग्र तपस्या करते हुए योग-धाम को प्राप्त
हुए ॥ २४२॥
इस प्रकार, संसार में चञ्चला स्त्रियाँ विपत् और वैराग्य देनेवाले अपने दुष्पापों को
त्याग नहीं करतीं। पतिव्रता स्त्री भाग्यवान् विरले ही होती है जो अपने कुल को उसी प्रकार आनन्दित
करती है जैसे नई चन्द्रकला आकाश को शोभित करती है॥२४३॥
इस प्रकार गोमुख के मुख से इस विचित्र कथा को सुनकर नरवाहनदत्त के साथ मन्दारवती
बहुत सन्तुष्ट हुआ ॥२४४॥
महाकवि श्रीमत्सोमदेव भट्ट-विरचित कथासरित्सागर के मन्दारवती-लम्बक का
तृतीय तरङ्ग समाप्त