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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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दशम लम्बक १२१
ऐसा सोचकर राजा ने फाँसी पर लटकाये गये कर्पर के शव की रक्षा के लिए अपने
सिपाही नियुक्त कर दिये और उनसे कहा—॥६१॥
'जो भी कोई इस मुर्दे के लिए शोक करता हुआ इसका शव लेकर दाह आदि क्रिया करने
के लिए आये उसे पकड़ लेना। उससे मैं उस दुष्टा और कुल-कलंकिनी कन्या को प्राप्त कर
लूँगा ॥६२॥
राजा की आज्ञा पाये हुए सेवक उस कर्पर के शव की रक्षा करते हुए रात-दिन वहाँ
पहरा देने लगे ॥६३॥
इस बात का पता लगाकर घट ने राजपुत्री से कहा—'प्यारी वह कर्पर, मेरा बन्धु और
परम मित्र था। जिसकी कृपा से मैंने रत्नों और धन के साथ तुझे पाया है। उसके प्रेम से उऋण
हुए बिना मेरे हृदय को शान्ति न मिलेगी ॥६४-६५॥
इसलिए, मैं जाकर उसका शोक मनाता हूँ और अपनी युक्ति से उसका अग्नि-संस्कार
करके उसकी अस्थियों को किसी तीर्थ में प्रवाहित करता हूँ ॥६६॥
तुझे डरना न चाहिए। मैं कर्पर के समान मूढ़ नहीं हूँ। उस (राजकन्या) से इस प्रकार
कहकर उसने पाशुपत योगी का वेष बनाया और एक खप्पर में दही और भात रखकर मार्ग चलते
हुए मटकता-सा कर्पर के शव के पास आ गया। वहाँ आकर उसने हाथ से खप्पर को गिरा दिया
और 'हाय अमृत-भरे कर्पर, हाय अमृत-भरे कर्पर'—कहकर चिल्लाकर शोक करने लगा।
रक्षकों ने उसे टूटे हुए खप्पर के लिए शोक करके रोते हुए समझा। उसी समय उसने घर वापस
आकर राजपुत्री से सब कहा ॥६७-७०॥
दूसरे दिन स्त्री (बहू) का वेष धारण किए हुए एक सेवक के सिर पर धतूरा मिले
हुए भोजन का बरतन रखकर, दूसरे सेवक को पीछे किये हुए और स्वयं मद्य से उन्मत्त ग्रामीण
का वेष बनाकर सायंकाल के समय गिरता-पड़ता तथा लड़खड़ाता हुआ घट कर्पर के शव की रक्षा
करते हुए सिपाहियों के पास आ गया ॥७१-७२॥
वहाँ पर 'तू कौन है यह स्त्री कौन है? और भाई तू कहाँ जा रहा है? —पहरेदारों द्वारा
इस प्रकार पूछे जाने पर वह धूर्त बोला—'मैं गाँव का रहनेवाला हूँ। यह मेरी पत्नी है। यहाँ से
मैं ससुराल जा रहा हूँ। यह भोजन का सामान मैं उनके लिए ही लाया था किन्तु वार्तालाप होने
के कारण आप लोग भी मेरे मित्र हो गए हैं। अतः आधा ही अन्न वहाँ ले जाऊँगा और आधा
आपलोगों के लिए रहेगा। ऐसा कहकर उसने वह वस्तु निकालकर उन लोगों को खाने के
लिए दी। वे भी सभी हँसते हुए उसे खाने लगे ॥७३-७६॥
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