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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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द्वादश लम्बक ९९
पूंछ वाला सिर अन्धा था किन्तु प्राकृतिक सिर आँख वाला था। फिर भी उन
दोनों सिरों में परस्पर मैं प्रधान हूँ मैं प्रधान हूँ यह विवाद हो गया। वह साँप अपने वास्तविक
सिर से चलने-फिरने का काम लेता था। एक बार उसके पीछेवाले मुँह को मार्ग में बहुत कष्ट
उठाना पड़ा ॥१७६-१७७॥
उसने कहीं (किसी चीज से) लिपट कर साँप की गति को आगे बढ़ने से रोक दिया।
तब सर्प ने पिछले मुख को ही अगले सिर को जीतनेवाला बलवान् मान लिया ॥१७८॥
तब उसी अन्धे सिर से बाहर घूमता हुआ वह सर्प मार्ग न दीखने के कारण किसी गड्ढे
में जलती हुई अग्नि में गिर गया और जलकर मर गया ॥१७९॥
इस प्रकार जो लोग गुण के थोड़े और बहुत अन्तर को नहीं जानते वे अल्प गुणवाले का
संग करके दुर्दशा को प्राप्त होते हैं ॥१८०॥
चावल खानेवाले मूर्ख की कथा
अब चावल खानेवाले मूर्ख की कथा सुनो। एक मूर्ख पहली बार अपनी ससुराल
गया ॥१८१॥
वहाँ सास द्वारा पकाने के लिए रखे गये सफेद चावलों को देखकर उसने एक मुट्ठी
चावल खाने के लिए मुँह में डाल लिया ॥१८२॥
उसी समय सास के आ जाने के कारण लज्जित वह मूर्ख न तो चावलों को चबाकर
खा सका और न उगल ही सका ॥१८३॥
उसकी सास ने फूले गालवाले और बोलने में असमर्थ देखकर उस उसी समय अपने
पति को बुलवाया ॥१८४॥
उस श्वसुर ने भी उसकी यह दशा देखकर वैद्य को बुलाया। वैद्य ने भी वात (सूजन)
की आशंका से उसकी ठोढ़ी और सिर दोनों पकड़कर उसका मुँह खोल दिया ॥१८५॥
तब सास की हँसी के साथ ही उसके मुँह से चावल भी निकल पड़े। इस प्रकार
मूर्ख अनर्थ तो कर देते हैं, किन्तु उन्हें छिपाना नहीं जानते ॥१८६॥
गधे का दूध दुहने की कथा
एक समय कुछ मूर्ख बालकों ने माता को गाय भैंस आदि दुहते देखकर एक गधी को
पकड़कर दुहना प्रारम्भ किया। कोई उसे दुहने लगा, किसी ने दुहने का पात्र पकड़ा
और ऊपर कुछ बालक दूध पहले पियूँगा दूध पहले पियूँगा इस प्रकार कहकर परस्पर झगड़ने
लगे॥१८७-१८८॥