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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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प्रथम काण्ड ११
और नृपके पहुँच ही वह महादुःख को न प्राप्त होगा क्योंकि जिस कन्या दुःख-समय
गई है अथवा इस समय भी वह दुःख-समयका विश्वास न करके प्रसन्न हो रही है
कह देती है ॥
इसप्रकार हँस और बातचितकर जब वह रात्रि बीत गई तब प्रभातकाल में उठ
ऐसा कहने लगा
कि वह सुरक्षित उपवन में तू रह मैं जाता हूँ और वहाँ से तुझे अपने साथ
लियेआऊंगा तबतक तू यहीं पर ठहरना ।
इसप्रकार उससे कहकर वह दोनों तीरोंपर चढ़कर उस तालाबसे बाहर निकला-
जबतक कि भगवान् मरीचिमाली सूर्यदेवका उदय न हुआहो। तबतक तो वह
उस कन्याके पास आ पहुँचाजब उसका आगमन देखा तब दमयन्ती भयविह्वल हो उठी
इत्यादि ॥ १ ॥
॥ इति द्वितीय सर्ग समाप्त ॥
पश्चात् नलने राजासे कहा कि हे राजन् ! आप इस कन्याके स्वयंवरके
लिये शीघ्र तय्यारी करें क्योंकि यह शुभलग्न बार बार नहीं प्राप्त होता ऐसा
सुनकर नलने ...
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