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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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दशम लम्बक ८९७
तब वह यशोधर और लक्ष्मीधर, दोनों भाई यज्ञ करके यक्ष की कृपा से अक्षय धन और
विद्या प्राप्त कर सुखपूर्वक रहने लगे ॥९१॥
इस प्रकार धर्म की ओर प्रवृत्ति रखनेवाले और दुःख में भी अपने चरित्र को सुरक्षित
रखनेवालों की देवता भी रक्षा करते हैं ॥९२॥
इस प्रकार, वसन्तक द्वारा कही गई अद्भुत कथा से विनोदित और अपनी प्यारी शक्तियशा
के लिए उत्कण्ठित वत्सेश्वर का पुत्र वह नरवाहनदत्त भोजन के समय अपने पिता के बुलाने पर अपने
मन्त्रियों के साथ वहाँ गया और समुचित भोजन करके सायंकाल गोमुख आदि मन्त्रियों के साथ अपने
भवन में आ गया ॥९३-९५॥
अपने भवन में आने पर पुनः उसका मनोरंजन करने के लिए गोमुख ने कहा—'सुनिए,
मैं दूसरी कथा प्रारम्भ करता हूँ' ॥९६॥
मगर और बन्दर की कथा
समुद्र के किनारे, गूलर के वन में अपने यूथ से छूटा हुआ रक्तमुख नाम का एक
बन्दर था ॥९७॥
वृक्ष पर बैठकर गूलर खाते हुए उसके हाथ से छूटे हुए एक गूलर को समुद्र के जल में
रहनेवाले एक शिशुमार नामक मगर ने खा लिया और उसके स्वाद से प्रसन्न होकर उसने मीठी
आवाज दी। उसकी वाणी के रस से सन्तुष्ट बन्दर ने उसे बहुत-से गूलर के फल और
फेंक दिये ॥९८-९९॥
इसी प्रकार, बन्दर, प्रतिदिन जल में फल फेंकता था और शिशुमार, उन्हें खाकर
उसी प्रकार मधुर गान किया करता था। कुछ दिनों में उन दोनों की परस्पर मित्रता हो
गयी ॥१००॥
इस कारण प्रतिदिन वह शिशुमार, तट पर रहनेवाले बन्दर के साथ फल खाता हुआ
दिन व्यतीत कर सायंकाल अपने घर को जाता था ॥१०१॥
इस प्रकार सारे, दिन का विरह इनवाती बन्दर की मित्रता को न चाहनेवाली शिशुमार
की स्त्री ने बीमारी का बहाना बनाया ॥१०२॥
तब अत्यन्त दुःखी शिशुमार ने पत्नी से पूछा—'प्रिये बताओ तुम्हें क्या रोग है और
यह कैसे शान्त होगा ? ॥१०३॥
उसके इस प्रकार आग्रहपूर्वक पूछने पर भी जब उसकी स्त्री ने उत्तर न दिया तब उसके
गुह्य को न जाननेवाली सखी ने उससे कहा—॥१०४॥
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