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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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दशम लम्बक ८९१
बिजली को कौन स्थिर रख सकता है और चपल (दुराचारिणी) स्त्री को कौन रक्षा कर
सकता है? सती स्त्री केवल एक अपने चरित्र से ही रक्षित होती है॥४६॥
रक्षा की गई पतिव्रता दोनों लोकों में पति की रक्षा करती है, जैसा कि शाप और वर देने में
इस स्त्री ने मेरी रक्षा की है॥४७॥
इसकी कृपा से मैं इस व्यभिचारिणी स्त्री के सम्पर्क से बचा और उत्तम ब्राह्मण की हत्या
के पाप से भी बचा' ॥४८॥
इस प्रकार कहकर और यशोधर को बैठाकर उसने पूछा-'तुम दोनों कहाँ से आये हो और
कहाँ जा रहे हो यह मुझे बताओ' तब यशोधर ने अपना वृत्तान्त बताकर और उसका विश्वास
प्राप्त करके कुतूहलवश उससे भी पूछा-॥४९-५०॥
'हे महापुरुष यदि गुप्त रखने की बात न हो तो यह बताओ कि ऐसे भोग प्राप्त करने पर
भी तुम्हें यह वनवास कैसे मिला ? ॥५१॥
यह सुनकर, 'सुनो कहता हूँ' ऐसा कहकर वह पुरुष उससे बोला-'हिमालय के
दक्षिण की ओर कश्मीर नाम का देश है जिसे मानो ब्रह्मा ने मनुष्यों के लिए स्वर्ग का कौतूहल
दूर करने के हेतु बनाया है ॥५२-५३॥
जहाँ कैलास और श्वेतद्वीप के मुख्य निवास को छोड़कर शिव और विष्णु सैकड़ों स्थानों
में स्वयं प्रादुर्भूत होकर निवास करते हैं। जो देश वितस्ता नदी के जल से पवित्र एवं शूर तथा
विद्वान् व्यक्तियों से भरा है, जो छल कपट आदि दोषों से अजेय है अर्थात् जहाँ छल कपट का
नाम नहीं है और जिसे बलवान् शत्रु भी विजित नहीं कर सकते ॥५४-५५॥
मैं उस कश्मीर में भवशर्मा नाम का सामान्य स्थिति का ग्रामवासी ब्राह्मण-पुत्र था।
पूर्वजन्म में मेरी दो पत्नियाँ थीं। मैंने किसी समय भिक्षुओं के साथ सम्पर्क हो जाने के कारण
शास्त्र में कहे गये उपोषध नाम के नियम-व्रत को स्वीकार किया ॥५६-५७॥
उस व्रत के प्रायः समाप्त हो जाने पर मेरी सेज पर मेरी पापिनी पत्नी उत्सुक
जाकर सो गई ॥५८॥
रात के चौथे प्रहर में अपने व्रत का ध्यान न रहता हुआ नींद के नशे में मैंने उस स्त्री के
साथ समागम कर लिया। इस उस व्रत का इतना ही खण्डन हो जाने से मैं झाड़-गुल्म बनकर यहाँ
उत्पन्न हो गया। और, वे ही दोनों पत्नियाँ यहाँ भी मेरी पत्नियाँ हुईं ॥५९-६०॥