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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक ७३
इसलिए, हे देवि ! जब तुम पृथिवी पर रहनेवाले मानव का तबतक परित्याग
कर दो जबतक तुम्हारे पिता को मालूम नहीं होता और अपने समानजातीय मेरा वरण
कर लो' ॥२१०॥
उसके ऐसा कहने पर कटाक्ष से देखती हुई वह चंचलहृदया विद्याधरी सोचने लगी कि
'यह मेरे लिए उपयुक्त पति है। ॥२११॥
तब राजमञ्जन ने उसके हृदय के अभिप्राय को जानकर उसे भार्या बना लिया ।
एकान्त में दोनों (प्रेमी और प्रेमिका) के एकत्रित होने पर कामदेव किसकी परवाह करता
है ? ॥२१२॥
तदनन्तर, विद्याधर के चले जाने पर निश्चयदत्त सोमस्वामी से मिलकर आ
गया ॥२१३॥
उसके लौट आनेपर उस विरक्ता अनुरागपरा ने सिरदर्द का बहाना करके उससे
आलिंगन आदि द्वारा प्रेम-प्रदर्शन नहीं किया ॥२१४॥
उस सरलहृदय प्रेमी निश्चयदत्त ने उसका बहाना न समझकर वैसे ही वह दिन व्यतीत
किया और प्रातःकाल दुःखितचित्त होकर विद्या के बल से पुनः उस बन्दर के समीप
गया ॥२१४-२१५॥
उसके चले जानेपर, अनुरागपरा के बिना रात-भर का जगा हुआ वह कामी विद्याधर
फिर उसके पास आया। रात के जागरण से उत्कण्ठित उसे गल से लगाकर वह विद्याधर काम
क्रीडा से थककर वहीं सो गया ॥२१६-२१७॥
वह अनुरागपरा भी रात-भर जगने के कारण गाढ म सोये उस प्यारे का विद्याबल से
छिड़ाकर आ गई॥ २१८॥
इधर निश्चयदत्त भी बन्दर के पास पहुँचा । बन्दर ने भी उसका स्वागत करके समाचार
पूछा—॥२१९॥
'आज तुम खिन्नमन मालूम हो रहे हो ? क्या कारण है बताओ। तब निश्चयदत्त उस
बन्दर से बोला—'मित्र ! अनुरागपरा अस्वस्थ हो गई है। उसी से दुःखी हूँ। वह मेरे
प्राणों से भी प्यारी है ॥२२०-२२१॥
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