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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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दशम लम्बक ८८९
एक-एक पुरुष से मैने एक-एक अंगूठी ली हैं' ऐसा कहकर उसने अपने आँचल की गाँठ से
खोलकर उसे सौ अंगूठियाँ दिखा दीं ॥३१॥
तब यशोधर ने उससे कहा- 'तू सौ से समागम कर या साठ से मेरी तो तू माता है। मैं
उसके समान पवित्र नहीं हूँ' ॥३२॥
इस प्रकार यशोधर से तिरस्कृत स्त्री ने क्रोध से अपने पति को जगाकर और उसे यशोधर
को दिखाकर रोते हुए अपने पति से कहा- तुम्हारे सोये रहने पर इस पापी ने मुझे
बलात्कार करके भ्रष्ट कर दिया है। उससे यह सुनते ही उसका पति तलवार खींचकर उठ खड़ा
हुआ ॥३३-३४॥
तदनन्तर दूसरी पतिव्रता स्त्री ने उसके चरणों में गिरकर कहा- 'झूठे ही पाप न करो
मेरी बात सुनो ॥३५॥
इस पापिन ने इसे देखकर, तुम्हारी बगल से उठकर इससे आग्रहपूर्वक संगम करने की
प्रार्थना की किन्तु इस सज्जन ने इसे स्वीकार नहीं किया ॥३६॥
तू मेरी माता है ऐसा कहकर इसे फटकार दिया। इसी ईर्ष्या से इसने उसका वध कराने के
लिए तुम्हें जगाया है ॥३७॥
हे स्वामिन्, इसने वृक्ष पर रात को ठहरे हुए एक सौ पथिकों के साथ समागम किया है
और उनसे अंगूठियां ली हैं। वैर बढ़ने के भय से मैंने इस अकथनीय पाप की कथा तुमसे नहीं
कही ॥३८-३९॥
यदि तुम्हें विश्वास न हो तो इसके आँचल में बँधी हुई अंगूठियां देखो। यह मेरा
सती-धर्म नहीं है कि मैं स्वामी से झूठ बोलूँ ॥४०॥
हे स्वामिन् मेरे सतीत्व का विश्वास करने के लिए मेरा प्रभाव देखो। ऐसा कहकर उसने
क्रोध से देखकर एक वृक्ष को भस्म कर डाला और फिर प्रसन्न दृष्टि से देखकर उसे फिर
पहले से भी अधिक हरा-भरा बना दिया। यह देखकर उस का सन्तुष्ट पति उसे बड़ी देर तक
आलिंगन करता रहा ॥४१-४२॥
और, उस दूसरी स्त्री के आँचल से अंगूठियां पाकर उस पति ने उसकी नाक काटकर उसे दूर
कर दिया (निकाल दिया) ॥४३॥
और, पढ़ने के लिए जानेवाले उस यशोधर से क्षमा-प्रार्थना की तथा खेद और वैराग्य के साथ
वह उससे बोला- मैं इन दोनों पत्नियों को हृदय में रखकर ईर्ष्या के कारण इनकी रक्षा करता
रहा हूँ परन्तु आज इस दुष्टा स्त्री की रक्षा मैं न कर सका ॥४४-४५॥
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