Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 922 of 1079

Read in context
Page 922

षष्ठम लम्बक ८०३
तब साँप ने भंगियों के साथ उस राजा को विविध प्रकार की बातों से प्रसन्न करके
कपट से अपने को थका-हारा-सा प्रकट किया और मेढकराज से बोला-॥१५८॥
'स्वामी भोजन के बिना अब मैं नहीं चल सकता। इसलिए, मुझे भोजन दो। सेवक
बिना भोजन के कैसे रह सकता है ?॥१५९॥
यह सुनकर सवारी का शौकीन मेढकराज ने उस साँप से कहा—'तो कुछ थोड़े-से मेरे
अनुचर मेढ़कों को खा लो' ॥१६०॥
तब वह सर्प अपनी इच्छानुसार मेढ़कों को क्रमशः खाने लगा। सवारी के आनन्द से
अन्धा मेढकराज यह सब सहन करता था॥१६१॥
'इस प्रकार मूर्खों के भीतर घुसा हुआ बुद्धिमान् मूर्खों को ठग लेता है। इसी प्रकार,
महाराज मैंने भी शत्रुओं में घुसकर ही तुम्हारे शत्रुओं का नाश किया॥१६२॥
अतः बुद्धिमान् राजा को नीतिज्ञ भी होना चाहिए। अन्यथा सेवक मूर्ख राजा का
मनमाना मूँछते-खसोटते और नष्ट कर डालते हैं॥१६३॥
यह लक्ष्मी जुए के छल के समान छल से भरी जल-तरंग के समान चंचल और मदिरा
के समान मदीली होती है। इसलिए यह (लक्ष्मी) धैर्यशाली नीतिज्ञ व्यसनहीन और विशेषज्ञ
राजा के पास जाल से बँधी हुई-सी स्थिर रहती है ॥१६४-१६५॥
अतः अब तुम सावधान होकर नीतिज्ञ विद्वानों की बात मानकर, शत्रु के नाश हो जाने से
सुखी होकर निष्कण्टक राज्य का पालन करो' ॥१६६॥
मन्त्री चिरंजीवी से इस प्रकार कहा गया काकराज मेघवर्ण उस मन्त्री का सम्मान करके
उसी प्रकार राज्य करता रहा ॥१६७॥
ऐसा कहकर गोमुख ने वत्सराज के पुत्र नरवाहनदत्त से कहा- स्वामिन् इस प्रकार
बुद्धिबल से पशु-पक्षी भी राज्य करते हैं किन्तु बुद्धिहीन व्यक्ति धोखा में ही फँस जाते हैं और कष्ट
पाते हैं। इस प्रसंग में एक कथा सुनो॥१६८-१६९॥
किसी धनी सेठ का एक मूर्ख सेवक था जो शरीर में मालिश करना नहीं जानता था।
किन्तु 'जानता हूँ' इस अभिमान से बलपूर्वक मालिश करते हुए उसने स्वामी के शरीर की
चमड़ी उधेर दी॥१७०॥
तब स्वामी ने उसे निकाल दिया और वह दुःखी हुआ। इस प्रकार न जानते हुए भी हठ-
पूर्वक जो जानकारी का ढोंग रचता है वह नष्ट हो जाता है ॥१७१॥
और भी सुनो। मालव देश में दो ब्राह्मण-बन्धु रहते थे। उनके पैतृक धन का बँटवारा
नहीं हुआ था॥१७२॥
११