Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 918 of 1079

Read in context
Page 918

दशम लम्बक ८६९
'मुझसे भी बलवान् मेघ है, जो क्षण-भर में मुझे ढक देता है'—यह सुनकर मुनि ने सूर्य
को छोड़कर मेघ को बुलाया ॥१२८॥
उसे भी उसी प्रकार ऋषि ने कहा तो मेघ ने कहा—'मुझसे भी बलवान् वायु है जो
क्षण भर में ही मुझे चारों दिशाओं में बिखेर देता है ॥१२९॥
उसके इस प्रकार कहने पर मुनि ने वायु को बुलाया। मुनि के उससे भी उसी प्रकार
कहने पर वायु ने कहा—॥१३०॥
'पर्वत मुझसे भी बलवान् हैं जो मुझसे भी हिलाये नहीं जा सकते। यह सुनकर मुनि ने
एक पर्वतराज को बुलाया ॥१३१॥
उसी प्रकार जब मुनि ने पर्वतराज से कहा तब उसने कहा—'मुझसे भी बलवान्
चूहे हैं जो मुझमें भी छेद कर देते हैं'॥१३२॥
इस प्रकार क्रमशः सभी देवताओं से कहे गये मुनि ने एक जंगली चूहे को बुलाया और
उससे कहा— इस कन्या से विवाह करो। ऋषि के इस प्रकार कहने पर चूहे ने कहा—'यह मेरे
बिल में प्रवेश कैसे करेगी यह देख लीजिए' ॥१३३-१३४॥
'अच्छा तो ठीक है, यह कन्या पहले के ही समान चूहिया बन जाय' इस प्रकार मुनि ने
उसे चूहिया बनाकर उस चूहे को दे दिया ॥१३५॥
'इस प्रकार बहुत दूर जाकर भी जो जैसा है, वैसा ही है। इसलिए, हे चिरंजीविन्, तू
कभी उल्लूक नहीं बन सकेगा' ॥१३६॥
रक्ताक्ष से इस प्रकार कहे गये चिरजीवी ने सोचा कि उल्लूकराज ने इस नीतिज्ञ
रक्ताक्ष की बात नहीं मानी ॥१३७॥
शेष सभी मन्त्री मूर्ख हैं, इसलिए मेरा काम सिद्ध ही है। इस प्रकार सोचते हुए चिरजीवी
को लेकर, बल से गर्वित उल्लूकराज असमर्थ रक्ताक्ष की बात न मानकर अपने निवासस्थान
पर गया ॥१३८-१३९॥
उल्लूकराज से दिये गये मांस आदि पौष्टिक आहारों से पुष्ट होकर उसके पास रहते हुए
चिरजीवी मोर के समान सुन्दर पंखोंवाला हो गया ॥१४०॥
एक बार वह चिरजीवी उल्लूकराज से बोला—'स्वामिन् मैं जाता हूँ और काकराज को
विश्वास दिलाकर अपने स्थान पर ले आता हूँ ॥१४१॥
जिससे कि आप लोग रात में आक्रमण करके उसका नाश कर सकें। मैं आपकी (मुझ
पर की गई) इस कृपा का प्रत्युपकार करना चाहता हूँ ॥१४२॥