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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 906

द्वादश लम्बक ८५७
तब दिन का अन्धा और क्षुद्र उल्लू कैसे राजा बन सकता है। सभी क्षुद्र व्यक्ति
अविश्वासी होते हैं। इस विषय में एक कथा सुनो' ॥४६॥
शश और कपिञ्जल की कथा
किसी समय किसी वृक्ष पर मैं (कौआ) रहता था और उसी वृक्ष के नीचे अपना घर बनाकर
कपिञ्जल नाम का पक्षी भी रहता था ॥४७॥
वह कपिञ्जल किसी समय दूर देश को जाकर, जब बहुत दिनों तक नहीं लौटा तब
उसके घोंसले में एक शश आकर रहने लगा ॥४८॥
कुछ दिनों बाद कपिञ्जल लौट आया तब उसे घोंसले के विषय में 'यह मेरा है, तेरा नहीं'
दोनों में इस प्रकार का झगड़ा हो गया। तब वे दोनों इसका निर्णय करने के लिए किसी निर्णायक
को ढूंढने निकले। कौतुकवश मैं भी छिपे-छिपे उन दोनों के पीछे-पीछे गया ॥४९-५०॥
कुछ दूर जाकर, उन्होंने किसी तालाब के किनारे झूठा अहिंसा-व्रत धारण किये हुए
और ध्यान में आधी आँखें बन्द किये हुए एक बिलाव को देखा ॥५१॥
इसी धार्मिक व्यक्ति से न्याय क्यों न पूछें ऐसा कहकर वे दोनों उसके पास जाकर
बोले—॥५२॥
'भगवन् तुम धार्मिक और तपस्वी हो हमारे न्याय को सुनो। यह सुनकर वह बिलाव
बहुत थोड़े शब्दों में उन दोनों से बोला—॥५३॥
'मैं तपस्या से दुर्बल होने के कारण ऊँचा सुनता हूँ। इसलिए, तुम दोनों दूर से मेरे समीप
आ जाओ। भली भाँति न दिया गया न्याय दोनों लोकों का नाश करता है' ॥५४॥
ऐसा कहकर और उन दोनों को पास बैठाकर, उस क्षुद्र बिलाव ने शश तथा कपिञ्जल
दोनों को साथ ही मार डाला ॥५५॥
इसलिए, नीच कर्म करनेवाले दुर्जन का विश्वास न करना चाहिए। और इसीलिए, अत्यन्त
दुर्जन (कुष्ट) उल्लू को राजा नहीं बनाना चाहिए ॥५६।
कौए से इस प्रकार कहे गये पक्षी उसकी बात मानकर उल्लू का राज्याभिषेक रोककर
इधर-उधर उड़ गये ॥५७॥
वह उल्लू 'आज से हम और तुम दोनों परस्पर शत्रु हुए। याद रखना अब मैं जाता हूँ'
क्रोध पूर्वक इस प्रकार मुझसे कहकर चला गया ॥५८॥
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