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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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दशम लम्बक ८४९
एक मूर्ख योद्धा की कथा
अब नापित के शावक की कथा सुनो। कर्णाट देश के एक वीर ने युद्ध में शूरता
दिखाकर अपने स्वामी राजा को प्रसन्न किया। उस राजा ने भी प्रसन्न होकर उससे इच्छित वर
माँगने को कहा। उस षण्ढक योद्धा ने राजा से उसके भाई को वर में माँगा ॥१२३-१२४॥
प्रत्येक व्यक्ति अपने चित्त के प्रमाण से अपना भला या बुरा चाहता है। अब कुछ न
माँगनेवाले मूर्ख की कथा सुनो ॥१२५॥
'कुछ न' माँगनेवाले मूर्ख की कथा
राह चलते हुए एक मूर्ख से गाड़ी पर बैठे हुए एक व्यक्ति ने कहा- 'मेरी गाड़ी को
कुछ बराबर कर दो' ॥१२६॥
उस मूर्ख ने कहा-'यदि मैं बराबर कर दूँगा तो क्या देगा ? तब गाड़ीवाले ने कहा- 'कुछ
नहीं दूँगा। तब उस मूर्ख ने 'मुझे कुछ न दो' इस प्रकार कहकर गाड़ी को ठीक कर दिया
और कुछ न दो माँगा। तब गाड़ीवान हँसने लगा ॥१२७-१२८॥
'स्वामिन्, मूर्खजन इस प्रकार सदा हँसी के पात्र तिरस्कृत निन्दनीय और विपत्तियों के
शिकार होते रहते हैं और बुद्धिमान् समाज में सम्मान पाते हैं ॥१२९॥
इस प्रकार, गोमुख के मुँह से कही गई कथाओं के विनोद को मन्त्रियों के साथ सुनकर
युवराज नरवाहनदत्त रात में समस्त संसार को विश्राम देनेवाली नींद में सो गया ॥१३०॥
महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का
पञ्चम तरंग समाप्त
षष्ठ तरङ्ग
नरवाहनदत्त की कथा (कथागत)
रात बीतने पर प्रातःकाल नरवाहनदत्त उठकर पिता वत्सराज (उदयन) के दर्शन के
लिए उनके पास गया ॥१॥
वहाँ महारानी पद्मावती के भाई और मगधराज (प्रद्योत) के पुत्र सिंहवर्मा के आने पर
उनके स्वागत कुशल प्रश्न तथा अन्यान्य वार्तालाप में दिन व्यतीत होने पर नरवाहनदत्त
भोजन करके अपने भवन में आया ॥२-३॥
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