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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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द्वादश लम्बक ८४७
यह सुनकर उस कीर्तिसोम ने भाई के स्नेह से देना चाहते हुए भी स्त्री के भय से उसे
कुछ नहीं दिया। इस प्रकार दुष्ट स्त्रियों के वश में होना भी कष्टप्रद ही होता है॥३०८॥
तब यज्ञसोम ने यह सब समाचार पत्नी से कहा और ईश्वर की शरण होकर वह घर से
निकल पड़ा॥३०९॥
वह जाते हुए मार्ग में एक जंगल में पहुँचा तो दैववश वहाँ उसे एक अजगर निगल गया।
यह देखकर उसकी पत्नी भूमि में लोटकर रोने लगी॥३१०॥
उसका रोना-धोना सुनकर अजगर मनुष्य की वाणी में उससे बोला—'हे भली स्त्री
तू इस प्रकार क्यों रो रही है ?' तब उस ब्राह्मणी ने कहा ॥३११॥
'हे महाप्राणी मैं क्यों न रोऊँ, जब कि तूने विदेश में मुझ दुखिया का भिक्षापात्र ही हरण
कर लिया ॥३१२॥
मुझ स्त्री को अब कौन भीख देगा'। उस सदाचारिणी ब्राह्मणी के इस प्रकार कहने पर
अजगर ने अपने मुँह से उगलकर एक बड़ा-सा सोने का पात्र उसके आगे रख दिया और कहा—'यह
ले भिक्षा-पात्र। माँगने पर जो भी व्यक्ति इस पात्र में दान नहीं देगा उसके सिर के सैकड़ों
टुकड़े हो जायेंगे। यह मेरी सत्य वाणी है ॥३१३–३१५॥
तब वह सती ब्राह्मणी उस अजगर से बोली—'यदि ऐसा है, तो पहले तू ही इस पात्र में
मुझे पति की भिक्षा दे' ॥३१६॥
उसके ऐसा कहते ही अजगर ने समूचे और जीवित यज्ञसोम को उगल दिया॥३१७॥
उसे उगलते ही तुरन्त वह अजगर दिव्य पुरुष बन गया और प्रसन्न होकर उन दोनों (पति
पत्नी) से बोला—॥३१८॥
'मैं काञ्चनवेग नाम का विद्याधरों का राजा हूँ। मेरे इस शाप की अवधि सती स्त्री
के सम्भाषण तक थी। वह आज समाप्त हो गई। (अतः अब मैं पुनः अपने रूप में आ गया)
ऐसा कहकर और उस सोने के पात्र को रत्नों से भरकर प्रत्यक्ष विद्याधरराज आकाश में
उड़कर अपने लोक को चला गया। और, वे दम्पती रत्नों का पात्र लेकर अपने घर
आ गए॥३१९ - ३२१॥
घर आकर अक्षय धन वाला हुआ यज्ञसोम सुख से रहने लगा। विधाता सभी को उसके
मन और कर्म के अनुसार देता है ॥३२२॥