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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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प्रथम तन्त्रम् ८२१
इस प्रकार, वह साधु मेरा सर्वस्व लेकर और हार का सिर पर रख लिया। तदनन्तर
दोनों साधु निश्चिन्त होकर सो गये ।।११३।।
उन दोनों के प्रसन्न होकर सो जाने पर भोजन चुराने के लिए पुनः आये हुए मुझे स्थायी
साधु ने जगकर छड़ी से मेरे सिर पर मारा ।।११४।।
उस प्रहार से आहत मैं बिल में भाग गया किन्तु भाग्यवश मरा नहीं। उसके पश्चात्,
मुझमे उछलकर उससे भोजन लेने की शक्ति नहीं रह गई ।।११५।।
धन ही पुरुषों का यौवन है और धन का अभाव ही बुढ़ापा है। धन के अभाव से मनुष्य
का ओज तेज बल और रूप नष्ट हो जाता है।।११६।।
तदनन्तर, केवल अपने पेट भरने का यत्न करने में ही किसी प्रकार समर्थ देखकर मेरे सभी
साथी मुझे छोड़कर चले गये ।।११७।।
जीवन-निर्वाह न कर सकनेवाले स्वामी को सेवक पुष्पहीन वृक्ष को भ्रमर, जल-रहित
सरोवर को हंस चिरकाल तक उसका आश्रय पाकर भी छोड़ देते हैं।।११८।।
इस प्रकार, वहाँ बहुत समय से रूठा हुआ मैं इस लघुपती कौए की मित्रता पाकर
हे कण्ठश्रेष्ठ यहाँ तुम्हारे पास आ पहुँचा ।।११९।।
हिरण्यक के ऐसा कहने पर मन्थरक कछुआ बोला--मित्र यह तुम्हारा अपना ही स्थान
है। अतः तुम अधीर न होना ।।१२ ।।
गुणी के लिए कोई विदेश नहीं है। सन्तोषी के लिए कोई दुःख नहीं। धैर्यशाली के लिए
कोई विपत्ति नहीं और उद्योगी के लिए कोई कार्य असाध्य नहीं ।।१२१।।
कछुआ जब इस प्रकार कह ही रहा था कि बहेलिये से डरा हुआ चित्रांगद नाम का एक
हिरण दूर से उस वन में आ पहुँचा ।।१२२।।
उसे देखकर और उसके पीछे बहेलिये को न आते देखकर उसे धीरज बँधाकर कौए
कछुए आदि मित्रों ने उसके साथ भी मित्रता कर ली ।।१२३।।
परस्पर एक दूसरे की सहायता करते हुए वे चारों सु-हृदय मित्र सुखपूर्वक उस वन
में साथ ही रहने लगे ।।१२४।।
एक बार बहुत देर तक चित्रांगद को न आते हुए देखकर, उसे देखने के लिए वह
लघुपती कौआ ऊँचे वृक्ष पर चढ़कर चारों ओर उस वन को देखने लगा ।।१२५।।
और उसने नदी के एक किनारे पर बील और जाल में बँध हुए चित्रांगद को देखा। आकर
यह समाचार उसने चूहे तथा कछुए से कहा ।।१२६।।
तब आपस में विचार कर कौआ उस हिरण्यक चूहे को साथ ले जाकर बँधे हुए चित्रांगद
के पास ले गया ।।१२७।।