कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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तब मन्थर ने भी कौए से प्रशंसित चूहे से मित्रता करके उससे अपने स्थान से वैराग्य
होने का कारण पूछा ॥८५॥
तब उन दोनों के सुनते रहने पर हिरण्यक चूहे ने अपना वृत्तान्त इस प्रकार उनसे
कहा ॥८६॥
हिरण्यक चूहा और संन्यासी की कथा
एक बार मैं नगर के समीप बड़े बिल में रहता था। वहाँ रहता हुआ मैं राजा के भवन
से एक हार ले आया और उसे अपने बिल में रख दिया ॥८७॥
उस हार को देख-देखकर बड़े हुए बलवाले मुझे अन्न लाने में समर्थ जानकर दूसरे चूहों ने
घेर लिया ॥८८॥
इसी बीच मेरे बिल के पास एक संन्यासी मठ बनाकर रहने लगा। वह विभिन्न प्रकार
के भोजन भिक्षा करके लाता था ॥८९॥
वह भिक्षु, भोजन से बचे हुए अन्न को प्रात:काल खाने के लिए एक झोली में डालकर एक
खूँटी में लटका देता था ॥९०॥
उसके सोये रहने पर मैं बिल के मार्ग से उसके अन्दर घुसकर और ऊँचे उछल-उछल
कर प्रत्येक रात में उसका भोजन समाप्त कर देता था ॥९१॥
एक दिन उसके यहाँ उसका एक मित्र संन्यासी आ गया। वह संन्यासी अपने मित्र
से बातचीत करने लगा ॥९२॥
तब तक अन्न खाने के लिए मेरे वहाँ पहुँचने पर वह संन्यासी फटे हुए बाँस का एक टुकड़ा
लेकर और कान लगाकर उस भिक्षा के पात्र को वह बार-बार बजाने लगा ॥९३॥
बीच में बात को काटकर 'यह तुम क्या करते हो' इस प्रकार आये हुए मित्र द्वारा पूछे
जाने पर वह संन्यासी उससे बोला—॥९४॥
'यहाँ एक चूहा मेरा शत्रु हो गया है जो दूर ऊपर लटकाये हुए अन्न को भी उछल
उछलकर यहाँ से ले जाता है ॥९५॥
इस फटे बाँस से अन्न के बरतन को बार-बार बजाकर मैं उसे डराता हूँ। इस प्रकार,
कहते हुए उस साधु से दूसरा साधु बोला—'लोभ प्राणियों के लिए महान् हानिकारक है। इस
विषय में कथा सुनो। मैं एक बार तीर्थों का भ्रमण करता हुआ एक नगर में गया ॥९६-९७॥
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