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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक ६३
हृदय को अनेक प्रकार से आश्वासन देने पर और भगवान् का ध्यान करने के कारण मैं
मरा नहीं ॥१३४॥
जबतक तुमने मुझे उस मिट्टी के ढेर से नहीं निकाला तबतक मुझे भूख और
प्यास नहीं लगी ॥१३५॥
ज्ञान प्राप्त कर लेने पर भी मुझ में अभी तक ऐसी शक्ति नहीं आई कि मैं उस
बानर-योनि से छुटकारा पाऊँ ॥१३६॥
जब कोई योगिनी उसके मन्त्र द्वारा मेरे गले के डोरे को खोलेगी तभी मैं मनुष्य
बन जाऊँगा ॥१३७॥
यही मेरी कहानी है। मित्र ! अब तू बता कि इस अगम्य वन में कैसे
आया ? ॥१३८॥
इस प्रकार, बानर-रूपी सोमस्वामी नामक ब्राह्मण से कहा गया निश्चयदत्त उसने
किए अपना वृत्तान्त कहने लगा—॥१३९॥
कि कैसे वह विद्याधरी अनुरागपरा के कारण उज्जैन से यहाँ तक चला आया।
और द्यूत से जीती हुई—वश की हुई—यक्षिणी के द्वारा रात में कैसे यहाँ पहुँचाया गया—
इत्यादि सब वृत्तान्त उसने बन्दर से कहा ॥१४०॥
उसके आश्चर्य-भरे समाचार को सुनकर बन्दर बना हुआ बुद्धिमान् सोमस्वामी उससे
बोला—॥१४१॥
'तुमने भी मेरे ही समान स्त्री के पीछे कष्ट भोगा है किन्तु याद रखो किसी की स्त्री और
श्री (लक्ष्मी) कभी स्थिर नहीं रही। सन्ध्या के समान क्षणिक राग (प्रेम) वाली होती हैं। नदी
के समान इनका हृदय कुटिल (ऊँचा-नीचा) रहता है और नागिन की तरह ये अविश्वसनीय
तथा बिजली की तरह चंचल होती हैं ॥१४२-१४३॥
इसलिए, वह अनुरागपरा विद्याधरी तुम्हारे ऊपर आसक्त होकर भी किसी विद्याधर
जाति के कामी को पाकर तुम मनुष्य से विरक्त हो जायगी ॥१४४॥
इसलिए, तुम स्त्री के लिए यह परिणाम-नीरस व्यर्थ प्रयत्न मत करो। हे मित्र ! तुम
विद्याधरों की पुण्डरीकवती नगरी में न जाओ। यक्षिणी के कन्धे पर चढ़कर अपनी उज्जयिनी
नगरी लौट जाओ ॥१४५-१४६॥
हे मित्र ! मेरी बात मानो। मैंने भी पहले अपने मित्र की बात नहीं मानी इसीलिए अब
पश्चात्ताप कर रहा हूँ ॥१४७॥
जब मैं बन्धुदत्ता में अनुरक्त था तब मेरे एक परम स्नेही ब्राह्मण भवशर्मा ने मुझे इसी
प्रकार रोका और कहा था—॥१४८॥