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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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और, उसकी पत्नी जंगल की सूकरी बन गई वही सुग्गा तप के प्रभाव से पहले पड़ा हुआ
सब कुछ जानता है। इसलिए, इस सुग्गे की इस विचित्र कर्मगति को देखकर ही मैं हँसा था।
इस कथा को राजसभा में कहकर वह मुक्त हो जायगा ।।१५८ १५९।।
सोमप्रभ भी विद्याधर बनकर उस भीरुकन्या-शरीर को प्राप्त मकरन्दिका को प्राप्त
करेगा ही ।।१६०।।
और, यह मनोरथप्रभा भी इस समय राजा बने हुए मुनिकुमार रश्मिमान् को पति के
रूप में प्राप्त करेगी ।।१६१।।
सोमप्रभ भी पिता से मिलकर और फिर इसके आश्रम में जाकर प्रिया (मकरन्दिका)
की प्राप्ति के लिए शिवजी की आराधना कर रहा है ।।१६२।।
पुलस्त्य मुनि इस प्रकार कथा कहकर चुप हो गये और हर्ष तथा शोक से भरे हुए मैंने
अपने पूर्वजन्म का स्मरण किया ।।१६३।।
तब जो मुनि कृपा करके मुझे आश्रम तक ले गये थे उन मरीचि मुनि ने मुझे पाल-पोस
कर बड़ा किया ।।१६४।।
पंखों के जम जाने पर पक्षियों की स्वाभाविक चंचलता के कारण इधर उधर घूमता और
अपनी विद्या के आश्चर्य दिखाता हुआ मैं एक निषाद के हाथ लग गया और क्रमशः आपके पास भी
आ पहुँचा। अब पक्षियोनि में मेरा पाप क्षीण हो गया ।।१६५ १६६।।
इस प्रकार, उस राजसभा में अपनी कथा सुनाकर उस विद्वान् और विचित्र वाणीवाले
सुग्गे के मौन हो जाने पर वह राजा सुमन अत्यन्त हर्ष के कारण आत्मविस्मृत-सा
हो गया ।।१६७।।
इसी बीच तपस्या से प्रसन्न शिव ने स्वप्न में सोमप्रभ को आदेश दिया—'राजन् ! उठो
राजा सुमन के पास चलो। वह अपनी पत्नी मकरन्दिका को प्राप्त करोगे जो पिता के शाप
से मुक्ताफला नाम की धीवरपुत्री हो गई है और सुग्गा बने हुए अपने पिता को लेकर वह राजा
के पास गई है। वह विद्याधरी मुझे देखकर शापमुक्त होकर अपने पूर्वजन्म का स्मरण करेगी।
परस्पर परिचय से बढ़े हुए हर्ष में शोभित तुम दोनों का संगम होगा' ।।१६८-१७०।।
प्रसन्नवदन शिवजी ने स्वप्न में इस प्रकार कहकर अपने आश्रम में तप करती हुई
उस दूसरी मनोरथप्रभा से भी कहा—।।१७१।।
'जिसे तू चाहती थी वह इस समय सुमन नाम के राजा के रूप में अवतीर्ण
हुआ रश्मिमान् तू बन गया है। हे कल्याणी! वह तुम्हें देखते ही अपने पूर्वजन्म का स्मरण
करेगा' ।।१७२।।