कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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वहाँ जाते ही वह मेरे गले से चिपट गई। स्त्रियों का उग्र रूप से चढ़ा हुआ काम
एकमात्र भीर होता है ॥११४॥
इस प्रकार, वह बन्धुदत्ता प्रतिदिन पिता के घर से सखी के घर आकर मेरे साथ क्रीडा
करती रही ॥११५॥
एक बार उसका पति बहुत दिनों से पिता के घर रही हुई उसे अपने साथ ले जाने के
लिए मथुरा से आया। तदनन्तर पिता की आज्ञा से ले जाने के लिए उत्सुक पति को जानकर
बन्धुदत्ता अपने रहस्य को जाननेवाली सखी से बोली—॥११६-११७॥
मेरा पति मुझे अवश्य ही मथुरा ले जायगा और मैं सोमस्वामी के बिना जी नहीं
सकती ॥११८॥
इस विषय में अब कौन-सा उपाय किया जाय यह बताओ। इस प्रकार कही गई
बन्धुदत्ता की सुलसका नाम की योगिनी सखी बोली ॥११९॥
'मेरे पास दो मन्त्र हैं। एक मन्त्र से गले में डोरा बाँधने से मनुष्य तुरन्त बन्दर बन
जाता है ॥१२०॥
और, दूसरे मन्त्र से डोरा खोल देने पर फिर वह मनुष्य बन जाता है। बन्दर बन जाने
पर या पुनः मनुष्य बन जाने पर उसका ज्ञान नष्ट नहीं होता ॥१२१॥
अत हे सुन्दरी ! यदि तू चाहती है तो तेरे प्यार सोमस्वामी को मैं अभी बन्दर का
बच्चा बना देती हूँ। तू इसे खिलौना बनाकर साथ लेकर मथुरा चली जा। मैं दोनों मन्त्र और
उसकी युक्ति तुझे बता देती हूँ। इससे तुम एकान्त में इसे प्रिय पुरुष बनाकर इच्छानुसार संगम
कर सकोगी' ॥१२२—१२४॥
उस सखी से इस प्रकार कही गई बन्धुदत्ता ने मुझे बुलाकर यह योजना प्रेमपूर्वक
समझाई ॥१२५॥
मेरी सम्मति पाने पर उसकी सखी सुलसया ने मुझे मन्त्रित करके गले में डोरा
बाँधकर तुरन्त बन्दर बना दिया ॥१२६॥
मुझे बन्दर के रूप में ले जाकर बन्धुदत्ता अपने पति से बोली कि मेरी सखी ने मुझे
मन-बहलाव के लिए यह बन्दर दिया है ॥१२७॥
उसकी गोद में बैठे हुए उस खिलौने को देखकर उसका पति प्रसन्न हुआ। मैं सब समझता
हुआ और स्पष्ट बोलता हुआ भी बन्दर ही रहा ॥१२८॥