कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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'ले आयें राजा के इस प्रकार कहने पर, द्वारपाल के बताये मार्ग से वह म्लेच्छकन्या
राजसभा भवन के आँगन में आई। उसके आश्चर्यजनक रूप को देखकर सभी सभासद सोचने लगे
कि क्या यह मानुषी है अथवा कोई दिव्य स्त्री ॥२६-२७॥
वह कन्या राजा को प्रणाम करके बोली-'महाराज शास्त्रगज नाम का चारों वेदों का
ज्ञाता यह शुक है। यह कवि है। सम्पूर्ण विद्याओं और कलाओं में यह कुशल है। मैं इसे महाराज
के उपयुक्त समझकर यहाँ ले आई हूँ। आप इसे स्वीकार करें' ॥२८ २९॥
इस प्रकार, म्लेच्छकन्या द्वारा समर्पित शुक को द्वारपाल ने कौतूहलवश राजा के सामने
प्रस्तुत कर दिया। तब उस शुक ने एक श्लोक पढ़ा जिसका अर्थ है—॥३०॥
'राजन् यह तो उचित ही है कि आपके शत्रुओं की विरहिणी स्त्रियों के लम्बे श्वासों के
साथ निकलते हुए वायु से धुएँ से श्याम मुखवाली प्रताप-अग्नि सदा चमकती रहती है किन्तु
यह आश्चर्य की बात है कि शत्रु-स्त्रियों के दुःख के कारण निकले हुए आँसुओं की बाढ़ से वह
प्रताप अग्नि दसों दिशाओं में और भी प्रचंड रूप से जलती रहती है ॥३१॥
यह श्लोक पढ़कर और उसकी व्याख्या करके वह सुग्गा बोला-महाराज किस शास्त्र
से किस विषय का वर्णन करूँ आज्ञा दीजिए' ॥३२॥
तब राजा के आश्चर्य में निमग्न हो जाने पर उसका मन्त्री बोला-'प्रभो यह पूर्वजन्म का
कोई ऋषि शापवश सुग्गा बन गया है। इसे पूर्वजन्म की स्मृति है और उस जन्म के पढ़े हुए
विषयों का भी यह स्मरण करता है ॥३३-३४॥
'हे भद्र मुझे यही कौतूहल है कि तुम अपना ही वृत्तान्त बताओ तुम्हारा जन्म कहाँ
हुआ और शुक होने पर भी तुम्हारा शास्त्रों का ज्ञान कैसा ? साथ ही तुम कौन हो? ॥३५॥
शुक की आत्मकथा
तब वह शुक¹ आँसू गिराकर धीरे से बोला-'यह बात यद्यपि कहने योग्य नहीं है, फिर
भी आपकी आज्ञा से कहता हूँ सुनिए' ॥३६॥
हे राजन् ! हिमालय के समीप रोहिणी का एक वृक्ष है। वेदों के समान जिसकी अनेक
शाखाओं² में द्विज³ गण (पक्षी और ब्राह्मण) आश्रय लेते हैं ॥३७॥
१ यही कादम्बरी का वैशम्पायन शुक है।
२ वृक्ष के पक्ष में शाखा = डालें। वेद के पक्ष में शाखा = भाग।
३ द्विज के पक्ष में = पक्षी। वेद के पक्ष में = त्रिवर्ण (ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य)।
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