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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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षष्ठ लम्बक ७४३
उस राजा की हेमप्रभा नाम की रानी में पार्वती की कृपा से उत्पन्न हुई शक्तियशा नाम
की कन्या मुझे जानो ॥११॥
पाँच भाइयों में सबसे छोटी और अपने पिता की प्राणों से भी प्यारी कन्या मैने अपने
पिता की आज्ञा से व्रतों और स्तोत्रों से पार्वती को सन्तुष्ट किया ॥१२॥
उस प्रसन्न पार्वती ने मुझे सभी विद्याएँ देकर आज्ञा दी कि 'बेटी तुझे पिता से दसगुना
विद्याओं का बल प्राप्त होगा और वत्सराज का पुत्र तथा विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती
नरवाहनदत्त तेरा पति होगा' ॥१३-१४॥
इस प्रकार कहकर पार्वती अन्तर्धान हो गई और विद्याबल को प्राप्त कर मैं समस्त
गुणवती हो गई ॥१५॥
आज रात मुझे स्वप्न में दर्शन देकर पार्वती देवी ने आज्ञा दी कि 'बेटी प्रातःकाल ही
तुम अपने पति को देखना ॥१६॥
और, एक मास के पश्चात् आज के ही दिन यहाँ फिर आना। तब चित्त में इस निश्चय को
ठाने हुए तुम्हारा पिता तुम्हारा विवाह-संस्कार सम्पन्न करेगा' ॥१७॥
इस प्रकार की आज्ञा देकर देवी चली गईं और रात भी बीत गई। इसलिए, 'हे आर्यपुत्र
मैं तुम्हें देखने के लिए यहाँ आई हूँ ॥१८॥
तुम्हारा दर्शन हुआ अतः अब मैं जाती हूँ।" यह कहकर शक्तियशा अपनी सहेलियों के
साथ आकाश में उड़कर पिता के नगर को चली गई ॥१९॥
तब उसके विवाह के लिए व्याकुल नरवाहनदत्त एक मास को एक युग के समान समझता
हुआ अपने भवन को गया ॥२०॥
घर आकर उसे उदास देखकर गोमुख ने कहा-हे स्वामी तुम्हारे मन को बहलाने के
लिए मैं एक कथा कहता हूँ सुनो- ॥२१॥
दो विद्याधरियों की कथा
प्राचीन समय में कांचनपुरी नाम की एक नगरी थी। उसमें सुशर्मा नाम का महान्
राजा था ॥२२॥
दुर्गम भूमियों को आक्रान्त करके उस राजा ने शत्रुओं को भी ऐसा ही कर दिया (अर्थात्,
उसके शत्रु भी दुर्गम भूमि की शरण में चले गए) ॥२३॥
एक बार सभा (आम दरबार) में बैठे हुए राजा से द्वारपाल ने आकर निवेदन किया-
'महाराज निषादों की राजकन्या मुक्ताफला पिंजरे में रखे हुए शुक (तोते) को लेकर बाहर द्वार
पर खड़ी है। उसीके साथ उसका बड़ा भाई वीरध्वज है। वह आपको देखना चाहती है' ॥२४-२५॥