कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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'हे सज्जन ! मैं मनुष्य हूँ। बन्दर बनाया गया ब्राह्मण हूँ। मुझे निकालो। तब मैं अपना
सारा वृत्तान्त तुमसे कहूँगा' ॥९०॥
यह सुनकर आश्चर्य-चकित निश्चयदत्त ने भली भाँति भूमि खोदकर उसे बाहर
निकाला ॥९१॥
भूमि से निकला हुआ बन्दर उसके पैरों पर गिरकर फिर बोला—'तुमने कष्ट से मुझ
बचाते हुए मेरे प्राण दिये। तुम भी मेरे साथ थक गये हो। फल और जल ग्रहण करो।
तुम्हारी कृपा से मैं भी चिरकाल के बाद आज पारण करूँगा' ॥ ९२॥
ऐसा कहकर बन्दर उसे वहाँ से दूर एक पहाड़ी नदी के किनारे ले गया जहाँ स्वच्छ
एवं स्वादिष्ट फल और छायावाला एक वृक्ष था ॥९४॥
वहाँ स्नान करके मीठे फल खाया हुआ निश्चयदत्त जलपान किए हुए बन्दर के पास आकर
बोला—॥९५॥
'तू मनुष्य होकर भी बन्दर कैसे बना। तब बन्दर बोला कि सुनो अब मैं यह
कहता हूँ॥९६॥
बन्दर बने सोमस्वामी की कथा
मित्र ! वाराणसी नगरी में चन्द्रस्वामी नाम का एक ब्राह्मण था। उसकी पतिव्रता
स्त्री से उत्पन्न यह मैं उसका पुत्र हूँ ॥९७॥
मेरे पिता ने मेरा नाम सोमस्वामी रखा था। क्रमशः बड़ा होकर मैं कामकला नाम
की नगरी हाथी पर चढ़कर प्रयाण कर गया ॥ ८॥
किसी समय वाराणसी-निवासी धीरचे नाम के वैश्य की कन्या ने घर की खिड़की से
मुझे आते हुए देख लिया॥ ९ ॥
वह युवती मथुरा के प्रधान वैश्य शंखदत्त की पत्नी थी जो उस समय अपने पिता के
घर में रह रही थी ॥१० ॥
वह नेत्रों से उत्पन्न काम से विह्वल होकर उस वैश्य-कन्या ने मेरे सम्मुख खिन्न अपनी
विश्वस्त दूती को भेजा ॥११ ॥
उसने आकर मुझे दावानल जलाया दिखाया व उसके घर का कष्ट अपने कहकर व।
करने का सन्देश ॥ १२ ॥
इसके बाद उसने उस विश्वासपात्र दूती को उस दावानल से जलाए हुए अपने हृदय की
सान्त्वना के लिए शीघ्र उसे भेजा ॥१३ ॥
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