कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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मूल्य देकर रत्न खरीदनेवाले वैश्य का भी इसमें क्या अपराध है। राजा उदयन ने
मन्त्री की बातों का समर्थन किया ॥२०॥
और, भारवाहकद्वारा व्यय कर दिये गये पाँच हजार रुपया वैश्य को देकर उससे रत्न ले
लिया और पाँच हजार रुपये खा जानेवाले मजदूर से कंकण लेकर राजा ने उसे मुक्त कर दिया।
वह मजदूर भी अपने घर गया ॥२१ २२॥
यह रत्नदत्त—'विश्वासघाती और दुष्ट है' मन में इस प्रकार समझते हुए भी राजा ने
प्रयोजनवश उसका सम्मान किया ॥२३॥
उन सब के चले जाने पर राजा के सम्मुख बैठा हुआ वसन्तक बोला—'ओह ! भाग्य
से मारे हुए व्यक्तियों से मिला हुआ धन भी नष्ट हो जाता है' ॥२४॥
इस विषय में भद्रघट की भी इस भारवाहक के ही समान स्थिति हुई। सुनिए—
भद्रघट की कथा
पाटलिपुत्र नामक नगर में शुभदत्त नाम का एक लकड़हारा था। वह जंगल से लकड़ी काट
कर लाता और उसे बेचकर अपने परिवार का पालन करता था ॥२५-२६॥
एकबार वह जंगल में दूर तक चला गया और उसने वैभवोप से वहाँ रहनेवाले और
दिव्य वस्त्राभंकार धारण किये हुए चार यक्षों को देखा ॥२७॥
उन्हें देखकर डरे हुए शुभदत्त को उन (यक्षों) ने ऐसा-वैसा ही दरिद्र समझकर दया
करके कहा—॥२८॥
हे भद्र तू यहाँ हमलोगों के पास सेवक होकर रह। हमलोग बिना किसी कष्ट के तेरे
घर का निर्वाह करेंगे ॥२९॥
उनके इस प्रकार कहने पर शुभदत्त ने स्वीकार कर लिया और स्नान आदि कराने
के कार्य से उनकी सेवा करने लगा ॥३०॥
तब भोजन का समय आने पर, भोजन के लिए बैठे हुए यक्षों ने उससे कहा कि इस सामने
रखे भद्रघट से हमको भोजन थामो ॥३१॥
उस घट को अन्दर से सूना देखकर वह चुप खड़ा हुआ कुछ विस्मय करने लगा। तब वे
यक्ष मुस्कराते हुए फिर उससे बोले—॥३२॥